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हयग्रीव जयंती: ज्ञान के देवता भगवान विष्णु के अश्वमुखी अवतार की कथा, महत्व और मान्यताएं

हयग्रीव जयंती बृहस्पतिवार, 27 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी।

 पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 27 अगस्त 2026 को प्रातः 09:08 बजे से होगा। 

पूर्णिमा तिथि का समापन 28 अगस्त 2026 को प्रातः 09:48 बजे पर होगा।

वही हयग्रीव जयंती पूजा मुहूर्त सायं 04:14 बजे से 06:48 बजे तक रहेगा।

इस शुभ मुहूर्त की कुल अवधि 02 घंटे 34 मिनट की होगी।

हिन्दू धर्म में भगवान श्रीहरि विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा गया है। जब-जब ब्रह्मांड में ज्ञान, धर्म और सत्य पर संकट आया है, तब-तब भगवान विष्णु ने विभिन्न अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा की है। इन्हीं अद्भुत अवतारों में से एक है हयग्रीव अवतार‘ (Hayagriva Avatar)

श्रावण (सावन) मास की पूर्णिमा के दिन (जिस दिन रक्षाबंधन और उपाकर्म भी मनाया जाता है), भगवान हयग्रीव का अवतरण हुआ था। इसी पावन दिन को हयग्रीव जयंती के रूप में बड़े ही उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है। मुख्य रूप से दक्षिण भारत और वैष्णव संप्रदाय में इस पर्व का अत्यंत विशेष महत्व है।

आइए, विद्या और ज्ञान के इस सर्वोच्च देवता की कथा, महत्व और मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।

Hayagriva Jayanti puja

हयग्रीव अवतार क्या है?

संस्कृत में हय का अर्थ होता है अश्व (घोड़ा) और ग्रीव का अर्थ होता है गर्दन या मुख। अर्थात्, भगवान विष्णु का वह अवतार जिसका धड़ (शरीर) मनुष्य का था और मुख (चेहरा) एक श्वेत (सफेद) अश्व का था, उसे ‘हयग्रीव’ कहा गया।

भगवान हयग्रीव को सभी वेदों, शास्त्रों, ज्ञान और विद्याओं का मूल उद्गम (स्रोत) माना जाता है। देवी सरस्वती, जो ज्ञान की देवी हैं, उन्होंने भी भगवान हयग्रीव से ही ज्ञान प्राप्त किया था। हयग्रीव भगवान हमेशा श्वेत वस्त्र धारण करते हैं और श्वेत कमल पर विराजमान होते हैं, जो परम शुद्धता और शांति का प्रतीक है।

 

हयग्रीव जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

हयग्रीव जयंती का पर्व अंधकार (अज्ञान) पर प्रकाश (ज्ञान) की विजय का प्रतीक है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से अत्यंत विशेष है:

  • भगवान हयग्रीव ने ही राक्षसों का वध करके वेदों को पुनः प्राप्त किया था। इसलिए, वेदों और शास्त्रों के अध्ययन की शुरुआत के लिए इस दिन को सबसे उत्तम माना जाता है।
  • जो छात्र शिक्षा, शोध (Research) या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए भगवान हयग्रीव की उपासना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इनकी पूजा से स्मरण शक्ति बढ़ती है और बुद्धि कुशाग्र होती है।
  • हयग्रीव भगवान अज्ञानता, आलस्य और मानसिक अंधकार को नष्ट कर मनुष्य को आत्मज्ञान के मार्ग पर ले जाते हैं।

हयग्रीव अवतार की पौराणिक कथा

श्रीमद्भागवत पुराण और स्कंद पुराण में भगवान हयग्रीव के अवतरण की एक अत्यंत रोचक कथा वर्णित है:

सृष्टि के आरंभ काल में, भगवान ब्रह्मा जी कमल के फूल पर विराजमान होकर वेदों के ज्ञान से सृष्टि की रचना कर रहे थे। उसी समय, ब्रह्मा जी के कानों के मैल (कुछ कथाओं में भगवान विष्णु के कानों के मैल) से मधुऔर कैटभ नामक दो अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली राक्षसों का जन्म हुआ।

इन दोनों राक्षसों ने ब्रह्मा जी से चारों वेद छीन लिए और उन्हें पाताल लोक (रसातल) में गहरे समुद्र के नीचे छिपा दिया। वेदों के छिन जाने से ब्रह्मा जी बहुत हताश हुए, क्योंकि वेदों के बिना सृष्टि का निर्माण और संचालन असंभव था। चारों ओर घोर अज्ञानता और अंधकार छा गया।

निराश होकर ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे वेदों को वापस लाने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी की पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने एक अत्यंत दिव्य और विशाल रूप धारण किया। उनका शरीर मनुष्य का और मुख सफेद घोड़े का था— यह उनका हयग्रीव अवतार था।

भगवान हयग्रीव सीधे रसातल में गए और उन्होंने वेदों का स्वर में गान करना शुरू किया। उनके अद्भुत स्वर को सुनकर मधु और कैटभ वहां पहुंचे। जैसे ही वे वहां आए, भगवान हयग्रीव ने वेदों को वापस ले लिया और ब्रह्मा जी को सौंप दिया। इसके बाद भगवान हयग्रीव और राक्षसों (मधु-कैटभ) के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें भगवान ने दोनों राक्षसों का वध कर दिया और सृष्टि को अज्ञानता के अंधकार से मुक्त किया।

 

प्रमुख मान्यताएं और पूजा विधि

हयग्रीव जयंती के दिन विशेष रूप से विद्या आरंभ (पढ़ाई शुरू करने) की रस्म निभाई जाती है। इस दिन की पूजा विधि और मान्यताएं इस प्रकार हैं:

  1. पूजा का समय: श्रावण पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। स्वच्छ और सफेद वस्त्र धारण करें, क्योंकि भगवान हयग्रीव को श्वेत रंग अत्यंत प्रिय है।
  2. प्रतिमा स्थापना: घर के मंदिर में भगवान विष्णु या भगवान हयग्रीव की तस्वीर स्थापित करें।
  3. विशेष नैवेद्य (भोग): दक्षिण भारत में भगवान हयग्रीव को कुल्थी (Horse Gram/Kollu) और इलायची व गुड़ से बने मीठे पकवान का भोग लगाने की विशेष मान्यता है।
  4. पुष्प और सामग्री: उन्हें श्वेत (सफेद) फूल, चंदन और कमल का फूल अर्पित करें।
  5. विद्यारंभ संस्कार: इस दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर लिखना सिखाया जाता है। जो लोग नई विद्या, संगीत या कला सीखना चाहते हैं, वे आज से ही उसकी शुरुआत करते हैं। पुस्तकों और कलम की पूजा की जाती है।
  6. मंत्र जाप: पूजा के दौरान भगवान हयग्रीव के दिव्य मंत्र ॐ हयग्रीवाय नम:” या ज्ञानानन्द मयं देवं निर्मल स्फटिकाकृतिं। आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीव मुपास्महे॥” (हयग्रीव स्तोत्र) का 108 बार जाप करना मानसिक शक्ति को अत्यंत प्रबल बनाता है।

निष्कर्ष

हयग्रीव जयंती हमें यह संदेश देती है कि धन, बल और संपत्ति नष्ट हो सकते हैं, लेकिन ‘ज्ञान’ एक ऐसा अमर तत्व है जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं। जीवन की असली सफलता अज्ञानता के राक्षसों को हराकर ज्ञान के प्रकाश को अपनाना है। सच्चे मन से भगवान हयग्रीव की वंदना करने से मनुष्य को न केवल लौकिक विद्या (Education) प्राप्त होती है, बल्कि उसे परम आध्यात्मिक शांति और मोक्ष का भी मार्ग मिल जाता है।


 || हरी शरणम् ||

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