हेरा पंचमी: पति-पत्नी के मधुर प्रेम, रूठने-मनाने और माता लक्ष्मी के 'क्रोध' का अनूठा उत्सव
हेरा पंचमी उत्सव शनिवार, 18 जुलाई 2026 को मनाया जायगा।
पंचमी तिथि प्रारम्भ: 18 जुलाई 2026, प्रातः 04:43 बजे ।
पंचमी तिथि समाप्त: 19 जुलाई 2026, प्रातः 03:43 बजे ।
हेरा पंचमी भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा से जुड़ा एक अत्यंत मनमोहक और अनूठा उत्सव है। यह पर्व देवी लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ के बीच के प्रेम और रूठने-मनाने की मानवीय लीला को दर्शाता है।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं, तो वे अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) में ही छोड़ जाते हैं। रथ यात्रा के ठीक पांचवें दिन (आषाढ़ शुक्ल पंचमी को) माता लक्ष्मी अपने पति को ढूंढ़ने और अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं। इसी अनूठी रस्म को ‘हेरा पंचमी’ कहा जाता है।
आइए, पति-पत्नी के इस दिव्य और मधुर झगड़े से जुड़ी हेरा पंचमी की कथा, महत्व और रहस्यमयी मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।
हेरा पंचमी क्या है?
यह पर्व रथ यात्रा शुरू होने के पांचवें दिन मनाया जाता है। ‘हेरा’ शब्द का अर्थ होता है ‘देखना’ या ‘ढूंढना’। इस दिन, देवी लक्ष्मी अपने पति भगवान जगन्नाथ को ढूंढने और उनसे मिलने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं। यह पर्व आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।
यह उत्सव भगवान जगन्नाथ के अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ बिना बताए मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) चले जाने के कारण, उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी के क्रोध और विरह को दर्शाता है।
पौराणिक कथा (Katha)
हेरा पंचमी की कथा भगवान जगन्नाथ और देवी लक्ष्मी के बीच के प्रेमपूर्ण मानवीय रिश्ते को दर्शाती है:
रथ यात्रा के दौरान, भगवान जगन्नाथ, अपने भाई-बहन के साथ, अपनी पत्नियों (देवी लक्ष्मी और विमला) को बिना बताए अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) चले जाते हैं।
पांचवें दिन, देवी लक्ष्मी को पता चलता है कि उनके पति उन्हें छोड़कर गए हैं। उन्हें गुस्सा आता है और वह अकेली पड़ जाने के कारण दुखी भी होती हैं। विरह और क्रोध से भरकर, देवी लक्ष्मी अपनी सेविकाओं के साथ एक पालकी में सवार होकर, भगवान को खोजने और उन्हें वापस पुरी मंदिर लाने के लिए गुंडिचा मंदिर की ओर निकलती हैं।
जब देवी लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर पहुँचती हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि भगवान अभी दर्शन नहीं देंगे। गुस्से में आकर, देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के रथ ‘नंदीघोष‘ का एक हिस्सा (विशेषकर रथ का पहिया) तोड़ देती हैं। अपना क्रोध और निराशा व्यक्त करने के बाद, देवी लक्ष्मी गुप्त रूप से पुरी मंदिर वापस लौट आती हैं। यह कार्य भगवान को यह संकेत देने के लिए किया जाता है कि उन्हें अब वापस लौट आना चाहिए।
इस रूठने-मनाने की लीला के बाद, भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी के पास वापस आने का संकल्प करते हैं, जिसके बाद ‘बाहुड़ा यात्रा’ (वापसी यात्रा) होती है।
रथ तोड़ने की अनोखी मान्यता और रस्में
जब माता लक्ष्मी को गुंडिचा मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं मिलता, तो वे अपना गुस्सा भगवान जगन्नाथ के रथ ‘नंदीघोष‘ पर उतारती हैं।
- रथ का पहिया तोड़ना: माता लक्ष्मी के सेवक (जिनकी भूमिका मंदिर के सेवायत निभाते हैं) भगवान जगन्नाथ के विशाल रथ ‘नंदीघोष’ के पास जाते हैं और गुस्से में रथ की लकड़ी का एक छोटा सा हिस्सा या पहिये का एक टुकड़ा तोड़ देते हैं। यह रस्म यह दर्शाने के लिए है कि “यदि आप मेरे पास नहीं लौटेंगे, तो मैं आपका रथ तोड़ दूंगी, जिससे आप यहीं फंसे रहेंगे।”
- चोरी-छिपे वापस लौटना: रथ को नुकसान पहुंचाने के बाद, माता लक्ष्मी को लगता है कि उन्होंने गुस्से में गलत कर दिया है और भगवान जगन्नाथ उनसे नाराज हो सकते हैं। इसलिए, वे मुख्य रास्ते (बड़दांड) से वापस न लौटकर, एक संकरी और गुप्त गली से चुपचाप अपने मंदिर लौट आती हैं। इस गुप्त रास्ते को पुरी में ‘हेरा गोहिरी साही‘ (Hera Gohiri Sahi) कहा जाता है।
हेरा पंचमी का महत्व (Significance)
हेरा पंचमी का महत्व कई मायनों में अनूठा है:
- यह उत्सव दर्शाता है कि भगवान के रिश्ते भी मानवीय भावनाओं (जैसे प्रेम, गुस्सा, विरह और रूठना-मनाना) से भरे होते हैं। यह आम गृहस्थ जीवन का प्रतिबिंब है।
- यह पर्व भगवान की शक्ति (देवी लक्ष्मी) के महत्व को दर्शाता है, जो उनके बिना अपूर्ण हैं। यह शक्ति ही उन्हें संसार में वापस आने को प्रेरित करती है।
- यह रथ यात्रा की समाप्ति की शुरुआत का संकेत है, क्योंकि इसके बाद भगवान की वापसी की तैयारी शुरू हो जाती है।
मान्यता और परंपराएं (Manyata & Rituals)
- माँ लक्ष्मी का जुलूस: इस दिन देवी लक्ष्मी की प्रतिनिधि प्रतिमा को एक विशेष पालकी में (जिसे ‘हेरा गोसाईं’ कहा जाता है) गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है।
- रूठने की रस्म: गुंडिचा मंदिर पहुँचकर, माता लक्ष्मी का रथ (नंदीघोष) के पास एक स्थान पर ले जाया जाता है। वहाँ सांकेतिक रूप से रथ के एक भाग को तोड़ने की रस्म निभाई जाती है।
- लड्डू का भोग: भगवान को प्रसन्न करने और मनाने के लिए, देवी लक्ष्मी की ओर से उन्हें विशेष रूप से तैयार किए गए लड्डू का भोग अर्पित किया जाता है।
- गुप्त वापसी: रूठने की रस्म पूरी करने के बाद, माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर से मुख्य मंदिर तक गुप्त रास्ते से वापस लौट आती हैं, जो उनके क्रोध और जल्दबाजी को दर्शाता है।
निष्कर्ष
हेरा पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रेम, मान-मनुहार और अपनापन का सुंदर प्रतीक है। यह उत्सव हमें बताता है कि जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ रूठना और मनाना भी स्वाभाविक होता है। भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी की यह मधुर लीला भक्तों के हृदय को भाव-विभोर कर देती है।
जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान मनाई जाने वाली हेरा पंचमी इस पावन उत्सव को और भी जीवंत और विशेष बना देती है।
|| जय जगन्नाथ प्रभु ||
