माँ स्कंदमाता: कथा, स्वरूप, पूजा विधि और मंत्र
नवरात्रि के पाँचवें दिन नवदुर्गा के पाँचवें स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है।
भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद भी है। स्कंद कुमार की माता होने के कारण देवी के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है।
माँ स्कंदमाता का स्वरूप मातृत्व, करुणा, शक्ति और वात्सल्य का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा में माँ के साथ उनके पुत्र भगवान स्कंद के दर्शन और पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है।
📖माँ स्कंदमाता की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही किया जा सकता था।
इस वरदान के कारण तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी हो गया। उसने देवताओं और ऋषि-मुनियों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसके अत्याचारों से देवता चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना की। समय आने पर भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ। इन्हें ही स्कंद और कार्तिकेय के नाम से जाना जाता है।
बड़े होकर भगवान स्कंद ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर के विरुद्ध युद्ध किया। युद्ध में भगवान स्कंद ने तारकासुर का वध किया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। अपने पुत्र स्कंद की माता होने के कारण माता पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा गया।
माँ स्कंदमाता की कथा में मातृत्व, साहस, शक्ति और धर्म की रक्षा का सुंदर संदेश मिलता है।

🌺 माँ स्कंदमाता का स्वरूप
माँ स्कंदमाता को सामान्यतः चार भुजाओं वाली देवी के रूप में चित्रित किया जाता है। उनकी दो भुजाओं में कमल के पुष्प सुशोभित रहते हैं। एक भुजा में वे अपने पुत्र स्कंद कुमार को गोद में धारण करती हैं और दूसरी भुजा भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करने वाली मुद्रा में रहती है।
माँ का वाहन सिंह माना जाता है। उन्हें कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण पद्मासना भी कहा जाता है।
उनका स्वरूप अत्यंत शांत, तेजस्वी और दिव्य माना जाता है। माँ का यह रूप एक साथ ममता और शक्ति का संदेश देता है।
🌼माँ स्कंदमाता का महत्व
माँ स्कंदमाता को ममता, करुणा, शक्ति और वात्सल्य का स्वरूप माना जाता है।
उनकी गोद में विराजमान भगवान स्कंद यह संदेश देते हैं कि शक्ति के साथ प्रेम और करुणा का होना भी आवश्यक है।
माँ की आराधना करते समय भक्त अपने परिवार के सुख-शांति, बच्चों के कल्याण, सद्बुद्धि और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रार्थना करते हैं।
माँ स्कंदमाता का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि एक माँ अपने संतान की रक्षा और उसके कल्याण के लिए हर परिस्थिति का सामना करने की शक्ति रखती है।
🌸माँ स्कंदमाता की पूजा कब करें?
नवरात्रि के पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है।
इस दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करके विधि-विधान से देवी की आराधना करें।
नवरात्रि की तिथि और पूजा का समय हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग में दिए गए शुभ समय का पालन करना उचित होता है।
माँ स्कंदमाता की पूजा विधि
1. पूजा की तैयारी
सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करें और माँ स्कंदमाता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें।
पूजा सामग्री:
- माँ स्कंदमाता की तस्वीर या प्रतिमा
- भगवान स्कंद की तस्वीर, यदि उपलब्ध हो
- दीपक और घी
- धूप
- रोली
- चंदन
- अक्षत
- पुष्प
- फल
- केला
- मिठाई या अन्य सात्त्विक नैवेद्य
- जल
- पंचामृत
2. संकल्प
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार पूजा या व्रत का संकल्प लें।
3. माँ का आह्वान
दीप और धूप जलाकर माँ स्कंदमाता का ध्यान करें और उन्हें प्रणाम करके पूजा प्रारंभ करें।
4. पूजन
माँ को रोली, चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। इसके बाद फल और सात्त्विक नैवेद्य का भोग लगाएं।
माँ की गोद में विराजमान भगवान स्कंद को भी श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें।
5. मंत्र जाप
माँ स्कंदमाता के मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। भक्त अपनी सुविधा के अनुसार मंत्र का जाप कर सकते हैं।
6. कथा और आरती
माँ स्कंदमाता की कथा का पाठ या श्रवण करें। इसके बाद घी या कपूर के दीपक से आरती करें और माता से परिवार के सुख, शांति, सद्बुद्धि और कल्याण की प्रार्थना करें।
अंत में प्रसाद सभी भक्तों में वितरित करें।
माँ स्कंदमाता का मूल मंत्र
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
मंत्र का अर्थ: जो देवी सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित हैं, ऐसी यशस्विनी माँ स्कंदमाता हमें सदैव शुभ फल प्रदान करें।
माँ स्कंदमाता को क्या भोग लगाएं?
माँ स्कंदमाता को केले का भोग लगाने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार केले के साथ अन्य फल, मिठाई और सात्त्विक नैवेद्य भी अर्पित कर सकते हैं।
भोग के बाद प्रसाद को परिवार के सदस्यों और अन्य भक्तों में वितरित करना शुभ माना जाता है।
माँ स्कंदमाता की पूजा के साथ किए जाने वाले शुभ कार्य
माँ की पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, भोजन, वस्त्र, पुस्तकें या आवश्यक सामग्री जरूरतमंद लोगों को दान करना शुभ माना जाता है।
विशेष रूप से बच्चों को फल या मिठाई बांटकर उनके कल्याण की प्रार्थना करना माँ के वात्सल्य स्वरूप के अनुरूप एक सुंदर धार्मिक भाव माना जा सकता है।
नवरात्रि के इस दिन शिव-पार्वती और भगवान स्कंद का स्मरण करना भी भक्तिभाव की दृष्टि से शुभ माना जाता है।
नवरात्रि के पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की आराधना करके भक्त परिवार के सुख-शांति, संतान के कल्याण, सद्बुद्धि, आत्मबल और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की प्रार्थना करते हैं।
