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विन्ध्यवासिनी जयन्ती: शक्ति की साक्षात देवी और योगमाया के प्राकट्य का महा-उत्सव

विन्ध्यवासिनी जयंती 2026 शुक्रवार, 4 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

विन्ध्यवासिनी जयंती का शुभ पूजा मुहूर्त 4 सितम्बर की रात्रि 11:57 बजे से 5 सितम्बर की रात्रि 12:43 बजे तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि 45 मिनट है। 

अष्टमी तिथि का प्रारम्भ 4 सितम्बर 2026 को प्रातः 02:25 बजे होगा और इसका समापन 5 सितम्बर 2026 को रात्रि 12:13 बजे होगा।

भारतीय सनातन परंपरा में शक्ति उपासना का सर्वोच्च स्थान है। जब भी जाग्रत शक्तिपीठों की बात होती है, तो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं पर स्थित विन्ध्याचल धाम का नाम सबसे ऊपर आता है। यहाँ विराजमान माता विन्ध्यवासिनी को साक्षात देवी दुर्गा और माता योगमाया का स्वरूप माना जाता है।

माता विन्ध्यवासिनी के प्राकट्य और उनके विन्ध्य पर्वत पर निवास करने के पावन दिन को विन्ध्यवासिनी जयन्ती के रूप में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन शक्ति की आराधना, अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और देवी की कृपा प्राप्त करने का सबसे बड़ा अवसर होता है। आइए, माता विन्ध्यवासिनी की उत्पत्ति की कथा, इस जयन्ती के महत्व और विन्ध्याचल धाम से जुड़ी अद्भुत मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

विन्ध्यवासिनी देवी का दिव्य स्वरूप

माता विन्ध्यवासिनी कौन हैं? (स्वरूप और रहस्य)

‘विन्ध्यवासिनी’ का शाब्दिक अर्थ है- विन्ध्य पर्वत पर निवास करने वाली देवी। माता विन्ध्यवासिनी कोई और नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की माया (योगमाया) हैं, जिन्होंने द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए नंदबाबा और माता यशोदा की पुत्री के रूप में अवतार लिया था।

माता का यह स्वरूप अत्यंत शांत, करुणामयी और वात्सल्य से भरा हुआ है। यहाँ माता कमल के पुष्प पर विराजमान हैं और उनके दर्शन मात्र से भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं। विन्ध्याचल धाम भारत का एकमात्र ऐसा शक्तिपीठ है जहाँ माता के पूरे स्वरूप (शरीर) के दर्शन होते हैं।

 

विन्ध्यवासिनी जयन्ती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

विन्ध्यवासिनी जयन्ती शक्ति के उपासकों (शाक्त संप्रदाय) के लिए एक महापर्व है। इसका महत्व निम्नलिखित है:

  • मनोकामनाओं की पूर्ति: माता विन्ध्यवासिनी को ‘इच्छापूर्ति देवी’ भी कहा जाता है। जयन्ती के दिन माता की सच्चे मन से आराधना करने पर सुख, शांति, धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  • भय और संकट से मुक्ति: माता योगमाया ने कंस जैसे क्रूर राक्षस के अहंकार को तोड़ा था। इसलिए इनकी पूजा करने से जीवन के हर प्रकार के भय, शत्रु बाधा और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
  • त्रिकोण साधना का फल: इस दिन विन्ध्याचल में तंत्र और मंत्र की साधना करने वाले साधकों को असीम सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

माता विन्ध्यवासिनी के प्राकट्य की पौराणिक कथा

माता विन्ध्यवासिनी की कथा सीधे तौर पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी हुई है। श्रीमद्भागवत पुराण और मार्कंडेय पुराण में इसका अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है:

द्वापर युग में जब मथुरा के राजा कंस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब आकाशवाणी हुई कि उसकी चचेरी बहन देवकी का आठवां पुत्र ही उसका वध करेगा। मृत्यु के भय से कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को कारागार (जेल) में डाल दिया और उनके एक-एक करके सात बच्चों को मार डाला।

जब देवकी के आठवें गर्भ से साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो उसी समय गोकुल में नंदबाबा और माता यशोदा के घर योगमाया ने कन्या के रूप में जन्म लिया। भगवान विष्णु की प्रेरणा से वासुदेव जी रातों-रात कान्हा को गोकुल छोड़ आए और वहां जन्मी उस कन्या (योगमाया) को लेकर मथुरा के कारागार में आ गए।

जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के रूप में कन्या के जन्म का पता चला, तो वह तुरंत कारागार पहुँचा। वासुदेव और देवकी ने बहुत विनती की कि “यह तो कन्या है, इससे तुम्हें क्या खतरा हो सकता है?” लेकिन कंस नहीं माना। उसने जैसे ही उस नवजात कन्या को पैरों से पकड़कर पत्थर पर पटकना चाहा, वह कन्या उसके हाथों से फिसलकर आकाश में उड़ गई।

आकाश में जाकर उस कन्या ने अपना असली अष्टभुजी (आठ भुजाओं वाला) देवी का विराट रूप धारण कर लिया और कंस से कहा-अरे मूर्ख! मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तुझे मारने वाला तो इस धरती पर जन्म ले चुका है और सुरक्षित स्थान पर पहुँच गया है।”

इतना कहकर माता योगमाया आकाश मार्ग से सीधे विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं की ओर चली गईं और वहीं सदा के लिए स्थापित हो गईं। तब से लेकर आज तक उन्हें विन्ध्य पर्वत पर निवास करने के कारण माता विन्ध्यवासिनी और आठ भुजाएं होने के कारण अष्टभुजा देवी के नाम से पूजा जाता है।

 

विन्ध्याचल धाम की प्रमुख मान्यताएं और त्रिकोण परिक्रमा

विन्ध्याचल धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की त्रिकोण परिक्रमा‘ (Trikon Parikrama) है। जयन्ती के अवसर पर इस परिक्रमा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह परिक्रमा तीन देवियों के मंदिरों को जोड़ती है:

  1. माता विन्ध्यवासिनी (महा लक्ष्मी का स्वरूप): परिक्रमा की शुरुआत मुख्य मंदिर से होती है, जहाँ माता विन्ध्यवासिनी विराजमान हैं।
  2. काली खोह (महा काली का स्वरूप): यहाँ से कुछ दूरी पर एक गुफा (खोह) में माता महाकाली विराजमान हैं, जो जीवन से हर प्रकार के तंत्र-मंत्र और भय को नष्ट करती हैं।
  3. अष्टभुजा देवी (महा सरस्वती का स्वरूप): पहाड़ की चोटी पर अष्टभुजा देवी का मंदिर है। यह वही योगमाया हैं जो कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई थीं।

इन तीनों मंदिरों के दर्शन करने पर ही विन्ध्याचल की यात्रा और परिक्रमा पूरी मानी जाती है।

 

पूजा विधि और प्रसाद

  • विन्ध्यवासिनी जयन्ती के दिन माता को विशेष रूप से लाल चुनरी, लाल पुष्प (गुड़हल), सिंदूर, नारियल और पान अर्पित किया जाता है।
  • यहाँ माता को श्रृंगार का सामान चढ़ाने की विशेष परंपरा है।
  • इस क्षेत्र में लोकगीतों की बहुत समृद्ध परंपरा है। जयन्ती और नवरात्र के अवसर पर यहाँ महिलाएं माता के जागरण में कजरी‘ (Kajali) गीत गाकर देवी को प्रसन्न करती हैं।

निष्कर्ष

माता विन्ध्यवासिनी की जयन्ती हमें यह याद दिलाती है कि जब भी धरती पर अहंकार और अन्याय बढ़ता है, तब ईश्वरीय शक्ति किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा के लिए अवश्य प्रकट होती है। विन्ध्य पर्वत पर विराजमान माता का यह दरबार लाखों भक्तों की आस्था का वह केंद्र है, जहाँ से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। सच्चे मन से माता विन्ध्यवासिनी के चरणों में किया गया समर्पण मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में विजयी बनाता है।

|| जय माँ विन्ध्यवासिनी ||

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