मोक्षदा एकादशी: तिथि, पारण समय, पूजा विधि, व्रत कथा और धार्मिक महत्व
मोक्षदा एकादशी रविवार, 20 दिसम्बर 2026 को मनाई जाएगी।
एकादशी तिथि प्रारम्भ: 19 दिसम्बर 2026 को रात्रि 10:09 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 20 दिसम्बर 2026 को रात्रि 08:14 बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय: सोमवार, 21 दिसम्बर 2026, प्रातः 07:10 बजे से 09:13 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त: सायं 05:36 बजे
मोक्षदा एकादशी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और फलदायी व्रतों में से एक है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है- ‘मोक्ष‘ + ‘दा‘ (देने वाली)। यह एकादशी मनुष्य के पापों का नाश कर उसे और उसके पूर्वजों (पितरों) को मोक्ष प्रदान करती है।
यह व्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है।
यहाँ मोक्षदा एकादशी की कथा, महत्व और मान्यताओं का विस्तृत विवरण है:
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मोक्षदा एकादशी
यह व्रत मुख्य रूप से पितरों (Ancestors) को नर्क की यातनाओं से मुक्त कराने और स्वयं के लिए बैकुंठ लोक पाने के लिए किया जाता है।
इसी दिन द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘गीता‘ का ज्ञान दिया था। इसलिए यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जो ज्ञान पर्व (गीता जयंती) के रूप में भी मनाई जाती है।
पौराणिक कथा (राजा वैखानस और पिता का उद्धार)
इस एकादशी की कथा ब्रह्म पुराण में वर्णित है, जिसे भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था:
कथा: प्राचीन काल में चम्पक नगर में वैखानस (Vaikhanasa) नाम के एक धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखते थे। एक रात राजा ने बहुत भयानक सपना देखा। उन्होंने देखा कि उनके पिता नर्क में हैं और भयंकर यातनाएं भोग रहे हैं। सपने में उनके पिता चिल्ला रहे थे- “हे पुत्र! मुझे इस नर्क से बचाओ।”
सुबह उठकर राजा बहुत बेचैन हो गए। वे तुरंत विद्वान ब्राह्मणों और ऋषियों के पास गए और अपने सपने के बारे में बताया। ब्राह्मणों ने उन्हें ‘पर्वत मुनि‘ के आश्रम में जाने की सलाह दी, जो त्रिकालदर्शी (भूत, भविष्य, वर्तमान जानने वाले) थे।
राजा वैखानस पर्वत मुनि के पास पहुंचे और अपने पिता की मुक्ति का उपाय पूछा। मुनि ने ध्यान लगाया और बताया- “राजन! तुम्हारे पिता ने अपने पिछले जन्म में कामातुर होकर अपनी पत्नी पर अत्याचार किया था (ऋतुकाल में बलपूर्वक संबंध बनाए थे), इसी पाप के कारण वे नर्क भोग रहे हैं।”
उपाय और मुक्ति: राजा ने गिड़गिड़ाते हुए मुक्ति का उपाय पूछा। मुनि ने कहा- “हे राजन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की ‘मोक्षदा एकादशी‘ आने वाली है। तुम विधि-विधान से उस एकादशी का व्रत करो और उस व्रत का पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दो। इससे तुम्हारे पिता के पाप कट जाएंगे।”
राजा ने मुनि के कहे अनुसार श्रद्धापूर्वक मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और संकल्प लेकर उसका पुण्य अपने पिता को दान कर दिया। पुण्य मिलते ही आकाश से फूलों की वर्षा हुई और उनके पिता नर्क से मुक्त होकर बैकुंठ (स्वर्ग) चले गए। जाते-जाते उन्होंने पुत्र को आशीर्वाद दिया- “हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो।”
मोक्षदा एकादशी का महत्व (Significance)
- पितृ मोक्ष: यह एकादशी श्राद्ध के समान फल देती है। यदि किसी के पितृ नीच योनि में भटक रहे हों, तो इस व्रत के प्रभाव से उन्हें मुक्ति मिल जाती है।
- पाप नाश: इसे ‘पाप-मोचनी’ भी कहा जा सकता है क्योंकि यह ‘ब्रह्म हत्या’ जैसे बड़े पापों को भी नष्ट करने की क्षमता रखती है।
- गीता जयंती: इस दिन गीता का पाठ करना उतना ही पुण्यदायी है जितना कि हजारों यज्ञ करना। यह अज्ञानता के अंधेरे को दूर करती है।
- चिंतामणि के समान: जैसे चिंतामणि पत्थर सभी इच्छाएं पूरी करता है, वैसे ही यह एकादशी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थ देने वाली मानी गई है।
मान्यताएं और पूजा विधि (Rituals & Beliefs)
क. व्रत और संकल्प:
- सुबह स्नान करके भगवान दामोदर (श्री कृष्ण) का पूजन करें।
- हाथ में जल लेकर संकल्प लें: “आज मैं अपने पितरों की शांति और अपनी मुक्ति के लिए यह व्रत कर रहा/रही हूँ।”
ख. गीता और विष्णु पूजा:
- इस दिन भगवान विष्णु को धूप, दीप और तुलसी की मंजरी अर्पित करें।
- चूंकि यह गीता जयंती भी है, इसलिए ‘श्रीमद्भगवद्गीता‘ की पुस्तक की पूजा करें और कम से कम एक अध्याय (विशेषकर 11वां या 18वां अध्याय) का पाठ जरूर करें।
ग. रात्रि जागरण: मोक्षदा एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। भगवान के भजन और गीता के श्लोकों का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए।
घ. दान: अगले दिन (द्वादशी को) ब्राह्मणों को भोजन कराएं और जरूरतमंदों को वस्त्र या अन्न दान करके व्रत खोलें।
निष्कर्ष
मोक्षदा एकादशी का संदेश यह है कि ‘मोह‘ (Attachments) ही सारे दुखों की जड़ है। जिस प्रकार अर्जुन का मोह गीता सुनकर दूर हुआ था, उसी प्रकार इस एकादशी का व्रत हमारे मोह को नष्ट कर मोक्ष का मार्ग खोलता है।
मोक्षदा एकादशी का व्रत और पूजा अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है। यह वही दिन है जब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु (दामोदर रूप) के साथ-साथ श्रीमद्भगवद्गीता की भी पूजा की जाती है।
यहाँ सरल और शास्त्रोक्त चरणबद्ध (Step-by-step) पूजा विधि दी गई है:
दशमी तिथि (एक दिन पहले) की तैयारी
व्रत के नियम एकादशी से एक दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं।
- भोजन: दशमी की शाम (सूर्यास्त के बाद) भोजन न करें। दिन में भी चावल, दाल, लहसुन, प्याज और मांस-मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित है।
- दातुन: रात को ही दांत अच्छे से साफ कर लें ताकि मुंह में अन्न का कण न रहे।
- तुलसी: एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती, इसलिए दशमी को ही पूजा के लिए तुलसी दल तोड़कर रख लें।
एकादशी के दिन (पूजा का मुख्य दिन)
चरण 1: सुबह की शुरुआत और संकल्प
- स्नान: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-5 बजे) में उठें। पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- वस्त्र: स्वच्छ कपड़े पहनें। भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, इसलिए पीले वस्त्र पहनना बहुत शुभ होता है।
- संकल्प: पूजा घर में जाएं। हाथ में थोड़ा जल, अक्षत (चावल नहीं, तिल लें) और फूल लेकर संकल्प बोलें:
“हे भगवान श्री हरि! आज मैं अपने पितरों की मुक्ति और अपनी आत्मशुद्धि के लिए मोक्षदा एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूँ। मुझे इसे पूरा करने की शक्ति दें।”
चरण 2: भगवान की स्थापना और अभिषेक
- एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं।
- उस पर भगवान विष्णु या श्री कृष्ण की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
- यदि आपके पास ‘श्रीमद्भगवद्गीता‘ की पुस्तक है, तो उसे भी लाल कपड़े पर सम्मानपूर्वक पास में रखें।
- भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) से स्नान कराएं, फिर शुद्ध जल से नहलाएं।
चरण 3: श्रृंगार और भोग
- तिलक: भगवान को गोपी चंदन या हल्दी का तिलक लगाएं।
- पुष्प: पीले फूल (गेंदा) और तुलसी की माला अर्पित करें। (तुलसी भगवान को सबसे प्रिय है)।
- गीता पूजा: गीता जी की पुस्तक पर रोली और फूल चढ़ाएं।
- भोग: फलों (केला, सेब), दूध की मिठाई और मेवों का भोग लगाएं। भोग में तुलसी का पत्ता जरूर डालें।
चरण 4: आरती और पाठ (सबसे महत्वपूर्ण)
- घी का दीपक और धूप जलाएं।
- कथा: हाथ में फूल लेकर ‘मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा‘ (राजा वैखानस वाली कहानी) पढ़ें।
- गीता पाठ: चूंकि यह गीता जयंती है, इसलिए गीता के 11वें अध्याय या 12वें अध्याय का पाठ अवश्य करें।
- मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे कृष्ण हरे कृष्ण” मंत्र की एक माला (108 बार) जाप करें।
- अंत में आरती (“ॐ जय जगदीश हरे”) करें।
रात्रि जागरण
एकादशी की रात को सोने के बजाय भजन-कीर्तन या जागरण करना चाहिए। यदि जागरण संभव न हो, तो जमीन पर बिस्तर लगाकर सोएं और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
द्वादशी के दिन (व्रत खोलना/पारण)
- अगले दिन (द्वादशी) सुबह सूर्योदय के बाद स्नान करें और भगवान की पूजा करें।
- दान: किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन, सीधा (कच्चा राशन) या दक्षिणा दान करें। पितरों के नाम से दान देना इस दिन विशेष लाभकारी है।
- पारण: दान देने के बाद ही शुभ मुहूर्त में जल और सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज) ग्रहण करके व्रत खोलें।
पूजा सामग्री सूची (Puja Samagri List)
- विष्णु जी/कृष्ण जी की मूर्ति
- श्रीमद्भगवद्गीता की पुस्तक
- पीला कपड़ा (चौकी के लिए)
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी)
- तुलसी दल (बहुत जरूरी)
- पीले फूल और फल (केला)
- धूप, दीप, कपूर, चंदन, रोली
- हवन सामग्री (यदि हवन कर रहे हों)
इस विधि से पूजा करने पर भगवान दामोदर (विष्णु) और गीता माता दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
