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भगवन्नाम जप की अनंत महिमा | हरि नाम की शक्ति और नाम जप क्यों है सबसे श्रेष्ठ?

भगवान शंकर जी श्री हरी का नाम जप करते हुए

श्री भगवन्नाम जप की अनंत महिमा

प्रभु के पावन नाम की स्वाभाविक शक्ति अपार है। वह इस बात की प्रतीक्षा नहीं करती कि जप करने वाले की उसमें श्रद्धा है या नहीं। जैसे अग्नि स्पर्श करने पर जलाती ही है, वैसे ही भगवन्नाम अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है।

शास्त्रों में कहा गया है—

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः।
अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥

अर्थ दुष्ट चित्त वाला मनुष्य भी यदि भगवान श्रीहरि का स्मरण करे, तो वे उसके पापों का नाश कर देते हैं। जैसे अनजाने में भी अग्नि को छू लेने पर वह जलाती ही है।

भगवान के नाम का उच्चारण केवल पापों की निवृत्ति ही नहीं करता, बल्कि यह धारणा कि इसका अन्य कोई फल नहीं है—पूर्णतः भ्रम है।

शास्त्रों में कहा गया है—

सकृदुच्चरित येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥

अर्थ जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरों का एक बार भी उच्चारण कर लिया, उसने मोक्ष की यात्रा का संकल्प कर लिया।

इससे स्पष्ट होता है कि भगवन्नाम केवल पाप-नाशक ही नहीं, बल्कि मोक्ष का भी श्रेष्ठ साधन है। इसके साथ ही यह धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों को भी सिद्ध करता है।

न गङ्गा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्।
जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः।
अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

अर्थ जिसकी जिह्वा की नोक पर ‘हरि’ यह दो अक्षर बसते हैं, उसे गंगा, गया, सेतुबंध, काशी और पुष्कर जैसे तीर्थों की आवश्यकता नहीं रह जाती। जिसने ‘हरि’ का उच्चारण कर लिया, मानो उसने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया और अश्वमेध आदि सभी महान यज्ञ संपन्न कर लिए।

यह भगवन्नाम जीवन के दुःखों की अचूक औषधि है और मृत्यु के पश्चात परलोक-मार्ग का सबसे बड़ा सहारा है। ‘हरि’, ‘विष्णु’, ‘नारायण’, ‘कृष्ण’, ‘राम’—सभी नामों में समान रूप से असीम शक्ति निहित है।

नाम-संकीर्तन के लिए वर्ण, आश्रम या किसी विशेष पात्रता की आवश्यकता नहीं होती—

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातयः।
यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति सनातनम्॥

अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज—जो कोई भी जहाँ-तहाँ भगवान विष्णु का नाम संकीर्तन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त होता है।

यज्ञ, दान और तीर्थ-स्नान के लिए शुद्ध समय और विशेष नियमों की आवश्यकता होती है, परंतु भगवान के नाम-जप में ऐसा कोई बंधन नहीं है

शास्त्रों में कहा गया है—

गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् वापि पिबन् भुञ्जन् जपन् तथा।
कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्य मुच्यते पापकञ्चुकात्॥

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

अर्थ चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते—किसी भी अवस्था में ‘कृष्ण-कृष्ण’ का स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। चाहे वह पवित्र हो या अपवित्र, भगवान का स्मरण उसे भीतर और बाहर से शुद्ध कर देता है।

महापापों को भस्म करने वाली अग्नि-

कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते।
भस्मीभवन्ति सद्यास्तु महापातककोटयः॥

अर्थ जिसकी जिह्वा पर ‘कृष्ण’ नाम नृत्य करता है, उसके करोड़ों महापाप तत्काल भस्म हो जाते हैं।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है—

आश्चर्ये वा भये शोके क्षते वा मम नाम यः।
व्याजेन वा स्मरेद्यस्तु स याति परमां गतिम्॥

अर्थ आश्चर्य, भय, शोक या पीड़ा में—even अनजाने में—जो भगवान का नाम ले लेता है, वह भी परम गति को प्राप्त होता है।

कलियुग में यज्ञ, तप और कठिन साधनाएँ करना अत्यंत कठिन है, परंतु भगवान के नाम-संकीर्तन से वही फल सहज ही प्राप्त हो जाता है।

भगवान् शङ्कर पार्वती के प्रति कहते हैं-

ईशोऽहं सर्वजगतां नात्र विष्णोर्जपात् परम्।
सत्यं सत्यं वदामि ते, नान्या गतिः नराणाम्॥

अर्थ सम्पूर्ण जगत्का स्वामी होनेपर भी मैं विष्णुभगवानके नामका ही जप करता हूँ। मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ, भगवान्को छोड़कर जीवोंके लिये अन्य कर्मकाण्ड आदि कोई भी गति नहीं है।’ सत्ययुगमें ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञसे और द्वापरमें अर्चा-पूजासे जो फल मिलता है, कलियुगमें वह केवल भगवन्नामसे मिलता है। और भी है कि कलियुग दोषोंका निधि है, परन्तु इसमें एक महान् गुण यह है कि श्रीकृष्णसंकीर्तनमात्रसे ही जीव बन्धनमुक्त होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

इस प्रकार एक बार के नामोच्चारणकी भी अनन्त महिमा शास्त्रों में कही गयी है।

निष्कर्ष: प्रेम से जपें प्रभु का नाम

कलियुग में जहाँ शुद्धता, सामग्री और विधि-विधान के साथ यज्ञ-अनुष्ठान करना कठिन है, वहाँ हरिनाम संकीर्तन ही सबसे सरल और सर्वोत्तम मार्ग है।

यद्यपि भगवान के नाम का उच्चारण भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी पापों का नाश कर देता है, फिर भी एक सच्चे भक्त का लक्ष्य केवल पापों का नाश नहीं होना चाहिए, बल्कि निष्काम भाव से प्रभु के श्रीचरणों में प्रेम बढ़ाना होना चाहिए।

जितनी अधिक निष्कामता होगी, उतना ही अधिक भगवान के मधुर नाम का आनंद हृदय में प्रकट होगा।

महामंत्र

॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

भगवन्नाम जप की महिमा – FAQ

प्रश्न 1: भगवन्नाम जप क्या है?
उत्तर: भगवान के नाम का बार-बार उच्चारण करना भगवन्नाम जप कहलाता है। यह मन की शुद्धि और मोक्ष का सरल साधन है।

प्रश्न 2: भगवन्नाम जप करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: इससे पापों का नाश होता है, मन शांत होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

प्रश्न 3: क्या बिना श्रद्धा के नाम जप करने से भी फल मिलता है?
उत्तर: हाँ, भगवान के नाम में स्वाभाविक शक्ति होती है, इसलिए बिना श्रद्धा के भी इसका प्रभाव होता है।

प्रश्न 4: कलियुग में नाम जप का क्या महत्व है?
उत्तर: कलियुग में कठिन साधनाएँ संभव नहीं होतीं, इसलिए नाम जप ही सबसे सरल और प्रभावी साधन माना गया है।

प्रश्न 5: भगवन्नाम जप कब करना चाहिए?
उत्तर: भगवान का नाम जप किसी भी समय—चलते, बैठते, सोते या जागते—किया जा सकता है।

प्रश्न 6: क्या हर कोई नाम जप कर सकता है?
उत्तर: हाँ, कोई भी व्यक्ति—स्त्री, पुरुष, किसी भी वर्ण या अवस्था का—नाम जप कर सकता है।

प्रश्न 7: क्या नाम जप से मोक्ष मिलता है?
उत्तर: हाँ, शास्त्रों के अनुसार भगवान का नाम जप मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग है।

प्रश्न 8: सबसे श्रेष्ठ नाम जप कौन सा है?
उत्तर: ‘हरि’, ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘विष्णु’, ‘नारायण’—सभी नाम समान रूप से शक्तिशाली हैं।

प्रश्न 9: महामंत्र क्या है?
उत्तर: ॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

|| हरी शरणम् ||

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