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श्री जगन्नाथ विग्रह का रहस्य: क्यों अधूरी हैं भगवान की मूर्तियां? जानें निर्माण की अद्भुत कथा

भारत के चार पवित्र धामों में से एक, ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्यता, चमत्कारों और अनूठी परंपराओं के लिए पूरे विश्व में विख्यात है। हिंदू धर्म में आमतौर पर देवी-देवताओं की मूर्तियां पत्थर या धातु की बनी होती हैं और उनके रूप को अत्यंत बारीकी से उकेरा जाता है। लेकिन श्री जगन्नाथ मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण), उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा की मूर्तियां लकड़ी (दारु) की बनी हैं, और आश्चर्यजनक रूप से ये मूर्तियां ‘अधूरी’ (बिना हाथ-पैर की) प्रतीत होती हैं।

आखिर पूरे ब्रह्मांड के स्वामी श्री जगन्नाथ जी का स्वरूप ऐसा क्यों है? इसके पीछे भक्ति, वचन और ईश्वरीय लीला की एक अत्यंत रहस्यमयी और भावपूर्ण पौराणिक कथा छिपी है। आइए, भगवान जगन्नाथ के विग्रह (मूर्ति) निर्माण की कथा, इसके महत्व और मान्यताओं को विस्तार से समझते हैं।

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भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दिव्य विग्रह का निरम करते हुए देव शिल्पी विश्वकर्मा

श्री जगन्नाथ विग्रह के निर्माण की पौराणिक कथा

राजा इन्द्रद्युम्न की भक्ति और नीलमाधव की खोज

बहुत समय पहले मालवा के पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। एक रात उन्होंने स्वप्न में भगवान विष्णु के अद्भुत स्वरूप नीलमाधव के दर्शन किए। उस दिव्य रूप की छवि उनके हृदय में ऐसी बस गई कि उन्होंने निश्चय किया- जब तक नीलमाधव के दर्शन नहीं होंगे, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलेगा।

राजा ने अपने विद्वान ब्राह्मण पुरोहित विद्यापति को नीलमाधव की खोज के लिए चारों दिशाओं में भेजा। कई राज्यों, जंगलों और पर्वतों को पार करने के बाद विद्यापति वर्तमान ओडिशा के घने वन क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ उन्हें पता चला कि शबर (सवरा) जनजाति के प्रमुख विश्वावसु गुप्त रूप से भगवान नीलमाधव की पूजा करते हैं।

विश्वावसु किसी बाहरी व्यक्ति को उस दिव्य स्थान तक नहीं ले जाते थे। परिस्थितियोंवश विद्यापति का विवाह विश्वावसु की पुत्री ललिता से हुआ। कुछ समय बाद ललिता के आग्रह पर विश्वावसु विद्यापति को नीलमाधव के दर्शन कराने के लिए तैयार हुए, लेकिन एक शर्त रखी- पूरे रास्ते उनकी आँखों पर पट्टी बंधी रहेगी।

विद्यापति ने बुद्धिमानी से अपने वस्त्र में सरसों के दाने छिपा लिए और चलते समय उन्हें रास्ते में गिराते रहे। कुछ समय बाद उन दानों से पौधे उग आए, जिससे मार्ग की पहचान हो गई। इस प्रकार विद्यापति ने भगवान नीलमाधव के दुर्लभ दर्शन किए और वापस लौटकर राजा इन्द्रद्युम्न को सारी कथा सुनाई।

नीलमाधव का अंतर्धान

यह समाचार सुनते ही राजा इन्द्रद्युम्न विशाल सेना और ऋषि-मुनियों के साथ उस स्थान पर पहुँचे। लेकिन जब वे वहाँ पहुँचे, तब तक भगवान नीलमाधव अंतर्धान हो चुके थे।

अपने आराध्य के दर्शन न होने से राजा अत्यंत व्यथित हो गए। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और भगवान की आराधना में लीन होकर कठोर तपस्या करने लगे।

उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने आकाशवाणी की-

हे राजन! शोक मत करो। कलियुग में मैं दारु ब्रह्मअर्थात दिव्य काष्ठ (लकड़ी) के रूप में प्रकट होऊँगा। समुद्र तट पर एक दिव्य लकड़ी का लट्ठा मिलेगा। उसी से मेरे विग्रह का निर्माण कराकर मेरी स्थापना करो।”

समुद्र से प्रकट हुआ दारु ब्रह्म

कुछ समय बाद पुरी के समुद्र तट पर एक अद्भुत दिव्य लकड़ी का विशाल लट्ठा लहरों के साथ तैरता हुआ आया। उस लकड़ी से अलौकिक सुगंध निकल रही थी और उस पर शंख, चक्र, गदा तथा पद्म जैसे दिव्य चिह्न अंकित थे।

राजा के अनेक सैनिकों और बलवान योद्धाओं ने उसे किनारे लाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी उसे हिला तक नहीं सका।

तब आकाशवाणी हुई कि इस कार्य में विश्वावसु और विद्यापति दोनों की सहभागिता आवश्यक है। जैसे ही दोनों ने श्रद्धापूर्वक उस दारु ब्रह्म को स्पर्श किया, वह लकड़ी सहज ही समुद्र तट पर आ गई। यह दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।

रहस्यमयी बढ़ई का आगमन

अब प्रश्न था कि इस दिव्य काष्ठ से भगवान की मूर्ति कौन बनाए?

देश-विदेश के श्रेष्ठ शिल्पियों को बुलाया गया, परन्तु जैसे ही वे अपनी छेनी उस लकड़ी पर चलाते, उनके औज़ार टूट जाते। कोई भी उस दिव्य दारु ब्रह्म को तराश नहीं सका।

इसी बीच एक अत्यंत वृद्ध बढ़ई राजदरबार में पहुँचा। अनेक परंपराओं के अनुसार वह स्वयं देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा थे, जबकि कुछ मान्यताओं में उन्हें स्वयं भगवान विष्णु का ही दिव्य स्वरूप माना गया है।

उन्होंने राजा से कहा—

मैं इन विग्रहों का निर्माण करूँगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। जब तक मेरा कार्य पूरा न हो जाए, कोई भी मंदिर का द्वार नहीं खोलेगा। यदि किसी ने बीच में द्वार खोल दिया, तो मैं तुरंत कार्य अधूरा छोड़कर चला जाऊँगा।”

राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली।

रानी गुंडिचा की व्याकुलता और दरवाज़ा खुलना

राजा ने शर्त मान ली। वृद्ध बढ़ई कमरे में गया और दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया गया। अंदर से लकड़ी तराशने की (ठक-ठक) आवाज़ें आने लगीं।

कई दिन बीत गए। अचानक एक दिन अंदर से आवाज़ आना बिल्कुल बंद हो गई। राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी, रानी गुंडिचा को चिंता होने लगी कि कहीं वह बूढ़ा बढ़ई बिना खाए-पिए मर तो नहीं गया? रानी की व्याकुलता और ज़िद के आगे राजा को झुकना पड़ा और उन्होंने 21 दिन पूरे होने से पहले ही कमरे का दरवाज़ा खोल दिया।

दरवाज़ा खुलते ही वह वृद्ध बढ़ई वहां से रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया। कमरे में लकड़ी की तीन बड़ी मूर्तियां (भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) रखी थीं, लेकिन वे अधूरी थीं। उनके बड़े-बड़े चेहरे तो बन गए थे, लेकिन हाथ आधे थे और पैर बिल्कुल नहीं बने थे।

राजा इंद्रद्युम्न अपनी भूल पर फूट-फूट कर रोने लगे। तभी आकाशवाणी हुई- हे राजन! विलाप मत करो। यह मेरी ही लीला थी। कलियुग में मैं इसी अधूरेस्वरूप में अपने भक्तों की पूजा स्वीकार करूंगा। तुम इसी रूप में हमें वेदी पर स्थापित करो।”

राजा की आँखों से आनंद और भक्ति के आँसू बह निकले। उन्होंने विधिपूर्वक भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिष्ठा करवाई। तभी से पुरी धाम में भगवान इसी अद्वितीय और अलौकिक स्वरूप में विराजमान हैं और करोड़ों भक्तों की श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।

श्री जगन्नाथ विग्रह का आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व

भगवान जगन्नाथ का यह बिना हाथ-पैर वाला स्वरूप कोई अपूर्णता नहीं है, बल्कि यह वेदांत और उपनिषदों के सबसे गहरे रहस्य को दर्शाता है:

  1. उपनिषदों का प्रमाण: श्वेताश्वतर उपनिषद में परब्रह्म के बारे में कहा गया है- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता” (अर्थात् उस ईश्वर के हाथ-पैर नहीं हैं, फिर भी वह सब कुछ ग्रहण करता है और हर जगह पहुंच जाता है)। भगवान जगन्नाथ का स्वरूप इसी श्लोक का साक्षात प्रतीक है।
  2. भक्तों को गले लगाने की आतुरता: भगवान के हाथ (भुजाएं) आधे और आगे की ओर फैले हुए हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि ईश्वर अपने भक्तों को गले लगाने के लिए हमेशा अपनी बाहें फैलाए हुए हैं।
  3. बड़ी-बड़ी आंखें (चक्र डोला): भगवान जगन्नाथ की आंखें बहुत बड़ी और गोल हैं (जिनमें पलकें नहीं हैं)। इसका अर्थ है कि भगवान कभी सोते नहीं हैं; वे हर पल पूरे ब्रह्मांड और अपने भक्तों पर दृष्टि बनाए रखते हैं।

प्रमुख मान्यताएं और नवकलेवरपरंपरा

  • आदिवासी और वैदिक संस्कृति का संगम: श्री जगन्नाथ मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान की सेवा ब्राह्मणों (विद्यापति के वंशज) के साथ-साथ सबर/आदिवासी समाज (विश्वावसु के वंशज – जिन्हें ‘दैतापति’ कहा जाता है) के लोग भी करते हैं। यह सामाजिक समानता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • नवकलेवर (Nabakalebara): चूंकि मूर्तियां लकड़ी (दारु) की बनी होती हैं, इसलिए प्राकृतिक नियमों के अनुसार हर 12 से 19 साल में (जब आषाढ़ मास में अधिक मास पड़ता है) इन मूर्तियों को बदला जाता है। इस गुप्त और पवित्र अनुष्ठान को ‘नवकलेवर’ (नया शरीर धारण करना) कहा जाता है।
  • ब्रह्म पदार्थ: नवकलेवर के दौरान पुरानी मूर्तियों में से एक रहस्यमयी वस्तु (जिसे ‘ब्रह्म पदार्थ’ कहा जाता है) निकालकर नई मूर्तियों में स्थापित की जाती है। मान्यता है कि यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का जीवित हृदय है। इसे बदलते समय पूरे शहर की बिजली काट दी जाती है और पुजारियों की आंखों पर पट्टी बंधी होती है।

निष्कर्ष

श्री जगन्नाथ जी की मूर्तियां पहली नज़र में भले ही अधूरी लगें, लेकिन वे पूर्णता का प्रतीक हैं। भगवान ने यह स्वरूप धारण करके यह संदेश दिया है कि ईश्वर को किसी सुंदर आकार या रूप की आवश्यकता नहीं है; वे तो केवल भक्त के शुद्ध प्रेम और भाव के भूखे हैं। जो भी भक्त सच्चे हृदय से पुरी जाकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माता सुभद्रा के इस दिव्य स्वरूप के दर्शन करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट इस भवसागर में बह जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

🚩 बोलो श्री जगन्नाथ स्वामी की जय! 🚩

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