वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी: जीवन के हर संकट को समाप्त करने वाला व्रत
वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 29 अक्टूबर 2026, बृहस्पतिवार को मनाई जाएगी।
चन्द्रोदय: रात्रि 8:17 बजे
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 29 अक्टूबर 2026 को रात्रि 1:06 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर 2026 को रात्रि 10:09 बजे
सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (चौथे दिन) को ‘संकष्टी चतुर्थी’ का व्रत रखा जाता है। ‘संकष्टी’ का अर्थ ही है- संकटों को हरने वाली। साल भर में आने वाली सभी 12 संकष्टी चतुर्थियों पर भगवान श्री गणेश के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है।
कार्तिक मास (उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार) के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को ‘वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी‘ (Vakratunda Sankashti Chaturthi) कहा जाता है। चूँकि कार्तिक मास को भगवान विष्णु और आध्यात्मिक उन्नति का सबसे पवित्र महीना माना जाता है, इसलिए इस महीने में भगवान गणेश के ‘वक्रतुण्ड’ स्वरूप की आराधना करने का फल कई गुना बढ़ जाता है। आइए, इस महाव्रत के अर्थ, इसके गहरे आध्यात्मिक महत्व, मत्सरासुर के अहंकार को तोड़ने वाली पौराणिक कथा और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।
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वक्रतुण्ड संकष्टी का अर्थ
‘वक्रतुण्ड’ भगवान श्री गणेश के सबसे लोकप्रिय और प्रथम अवतारों में से एक है।
- वक्र (Vakra): का अर्थ होता है ‘टेढ़ा’ या ‘मुड़ा हुआ’।
- तुण्ड (Tunda): का अर्थ होता है ‘मुख’ या ‘सूंड’।
अर्थात्, “जिनकी सूंड मुड़ी हुई है, वे वक्रतुण्ड हैं।” भगवान गणेश की यह मुड़ी हुई सूंड इस बात का प्रतीक है कि वे सीधे और सरल भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य हैं, लेकिन जो लोग बुरे मार्ग पर चलते हैं, अहंकारी हैं या दूसरों को कष्ट देते हैं, भगवान उनकी बुद्धि को सीधा करने के लिए ‘वक्र’ (टेढ़े) मार्ग का भी प्रयोग कर सकते हैं। इस चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता के इसी न्यायकारी और संकटमोचक स्वरूप की वंदना की जाती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
मुद्गल पुराण के अनुसार, भगवान गणेश के 8 प्रमुख अवतार हैं, जिनमें ‘वक्रतुण्ड’ उनका पहला अवतार माना जाता है। इस दिन व्रत रखने का विशेष महत्व है:
- ईर्ष्या (Jealousy) और द्वेष का नाश: वक्रतुण्ड अवतार मुख्य रूप से मनुष्य के भीतर छुपे ‘मत्सर’ (ईर्ष्या या जलन) रूपी राक्षस का नाश करने के लिए है। इस व्रत को करने से मन से नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
- कार्यों की बाधाएं दूर होना: यदि आपके किसी महत्वपूर्ण काम में लगातार रुकावटें आ रही हैं, तो इस दिन गणेश जी को दूर्वा और मोदक अर्पित करने से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
- पारिवारिक शांति: यह व्रत परिवार में क्लेश को मिटाकर सुख, शांति और समृद्धि लाता है।
- कार्तिक मास का संयोग: कार्तिक महीने में किए गए दान, व्रत और पूजा का फल अक्षय (कभी खत्म न होने वाला) होता है।
वक्रतुण्ड संकष्टी की पौराणिक व्रत कथा (मत्सरासुर का प्रसंग)
भगवान गणेश के वक्रतुण्ड अवतार और इस चतुर्थी से जुड़ी कथा अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में ‘मत्सर‘ (जिसका अर्थ है ईर्ष्या या जलन) नाम का एक अत्यंत भयंकर असुर (राक्षस) था। उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने उसे वरदान दिया कि उसे कोई भी देवता, दानव या मनुष्य पराजित नहीं कर सकेगा।
वरदान पाते ही मत्सरासुर अजेय और अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने अपनी ईर्ष्या और क्रोध के कारण पृथ्वी और पाताल लोक पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवराज इंद्र और सभी देवताओं को वहाँ से भगा दिया। मत्सरासुर के अत्याचारों से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया।
निराश होकर सभी देवता भगवान शिव और ब्रह्मा जी के पास गए, लेकिन वरदान के कारण वे भी असहाय थे। तब सभी देवताओं ने मिलकर भगवान श्री गणेश की कठोर तपस्या की।
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान गणेश ने ‘वक्रतुण्ड‘ के रूप में अवतार लिया। वक्रतुण्ड स्वरूप में भगवान गणेश का वाहन मूसक (चूहा) नहीं, बल्कि एक अत्यंत पराक्रमी सिंह (शेर) था।
भगवान वक्रतुण्ड और मत्सरासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ। वक्रतुण्ड के असीम तेज और बल के सामने मत्सरासुर की एक न चली। जब मत्सरासुर को अपनी मृत्यु निश्चित दिखाई दी, तो उसका अहंकार टूट गया। वह दौड़कर भगवान वक्रतुण्ड के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए क्षमा मांगने लगा।
भगवान गणेश अत्यंत दयालु हैं। उन्होंने मत्सरासुर को क्षमा कर दिया, लेकिन यह शर्त रखी कि “आज के बाद तुम कभी भी उस स्थान पर या उस व्यक्ति के आस-पास नहीं भटकोगे, जहाँ मेरी पूजा हो रही होगी।” मत्सरासुर ने यह बात स्वीकार कर ली और पाताल लोक चला गया।
तभी से यह मान्यता है कि जो भी भक्त कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को भगवान वक्रतुण्ड का व्रत और पूजा करता है, उसके जीवन से हर प्रकार की ईर्ष्या, शत्रुता और संकट हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।
वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि और मान्यताएं
संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की पूजा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। इसकी पूजा विधि इस प्रकार है:
- सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और मन में पूरे दिन के व्रत (फलाहार या निर्जला) का संकल्प लें।
- संकष्टी की मुख्य पूजा शाम के समय (चंद्रोदय से कुछ समय पहले) की जाती है। एक स्वच्छ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश (वक्रतुण्ड स्वरूप) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- भगवान को कुमकुम, अक्षत, पीले पुष्प और उनकी सबसे प्रिय 21 हरी दूर्वा (घास) अर्पित करें। भोग में मोदक, तिल के लड्डू, केला और पंचामृत चढ़ाएं।
- भगवान वक्रतुण्ड की कथा (मत्सरासुर वध की कथा) पढ़ें। ‘ॐ वक्रतुण्डाय हुम्‘ या ‘ॐ गं गणपतये नमः‘ मंत्र का 108 बार जाप करें।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य (Arghya): इस व्रत में चंद्र दर्शन का सबसे अधिक महत्व है। रात को जब चंद्रमा उदय हो जाए, तो एक लोटे में शुद्ध जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, सफेद फूल और अक्षत डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।
- व्रत का पारण: चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद गणेश जी की आरती करें और सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज का) या फलाहार ग्रहण करके अपना व्रत खोलें।
निष्कर्ष
वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी केवल एक उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर झांकने का एक आध्यात्मिक अवसर है। मत्सरासुर कोई बाहरी राक्षस नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर बैठी ‘ईर्ष्या’ और ‘जलन’ की भावना है जो हमारी सफलता और शांति को नष्ट करती है। जब हम भगवान वक्रतुण्ड की सच्चे मन से शरण लेते हैं, तो वे अपनी मुड़ी हुई सूंड से हमारे मन के सारे टेढ़े और नकारात्मक विचारों को खींचकर बाहर निकाल देते हैं, और हमारे जीवन को सुख, सफलता और सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं।
|| जय श्री गणेश ||
