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वराह जयंती: पृथ्वी की रक्षा और भगवान विष्णु के तीसरे अवतार का उत्सव

वराह जयंती रविवार, 13 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

यह पर्व भगवान विष्णु के तृतीय अवतार भगवान वराह को समर्पित है। 

पूजा मुहूर्त: दोपहर 01:31 बजे से सायं 04:00 बजे तक

मुहूर्त अवधि: 02 घंटे 29 मिनट

तृतीया तिथि प्रारम्भ: 13 सितम्बर 2026 को प्रातः 07:08 बजे

तृतीया तिथि समाप्त: 14 सितम्बर 2026 को प्रातः 07:06 बजे

सनातन धर्म में जब भी धरती पर अधर्म, पाप और असुरों का अत्याचार बढ़ा है, तब-तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने धर्म और सृष्टि की रक्षा के लिए विभिन्न अवतार लिए हैं। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के दशावतारों (10 मुख्य अवतारों) में से तीसरा अवतार वराह अवतार‘ (Varaha Avatar) है।

जिस पवित्र दिन भगवान विष्णु ने आधे मानव और आधे वराह (जंगली सूअर) का रूप धारण कर पृथ्वी को पाताल लोक से बाहर निकाला था, उस दिन को वराह जयंती‘ (Varaha Jayanti) के रूप में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह परम कल्याणकारी पर्व मुख्य रूप से भाद्रपद (भादों) मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। (कुछ दक्षिण भारतीय पंचांगों में इसे माघ मास में भी मनाया जाता है)।

आइए, वराह जयंती के महत्व, प्राकट्य की अद्भुत कथा और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।

Lord Varaha rescuing Mother Earth

वराह जयंती क्या है?

‘वराह’ का अर्थ होता है ‘सूअर’ (Boar)। सतयुग में एक भयंकर राक्षस हिरण्याक्ष ने जब माता पृथ्वी (भूदेवी) का अपहरण कर उन्हें अथाह समुद्र (रसातल) में डुबो दिया था, तब ब्रह्मा जी की नाक से भगवान विष्णु ने एक छोटे से वराह के रूप में जन्म लिया और देखते ही देखते विशालकाय पर्वत का रूप धारण कर लिया।

वराह जयंती उसी दिव्य अवतार का जन्मोत्सव है। इस दिन भगवान विष्णु के वराह स्वरूप और माता भूदेवी (पृथ्वी माता) की विशेष रूप से आराधना की जाती है, ताकि घर-परिवार में सुख, संपत्ति और स्थिरता बनी रहे।

 

वराह अवतार के प्राकट्य की पौराणिक कथा (हिरण्याक्ष का वध)

वराह जयंती की यह कथा अत्यंत रोमांचक और ईश्वर की असीम शक्ति का प्रमाण है:

पौराणिक काल में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर पुत्र हुए-  हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। (हिरण्यकशिपु वही राक्षस है जिसका वध बाद में नरसिंह अवतार ने किया था)।

हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की और यह वरदान प्राप्त कर लिया कि कोई भी देवता, मनुष्य, असुर या सामान्य पशु-पक्षी उसे युद्ध में हरा या मार नहीं सकेगा। वरदान पाते ही वह अहंकार से भर गया। उसने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया।

अपने अजेय होने के घमंड में चूर होकर, हिरण्याक्ष ने माता पृथ्वी (भूदेवी) को अपनी शक्तियों से उठा लिया और उन्हें ब्रह्मांड के सबसे निचले हिस्से, रसातल (ब्रह्मांडीय महासागर) में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के डूबने से पूरी सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गई। सभी देवता घबराकर ब्रह्मा जी के पास गए, और ब्रह्मा जी देवताओं को लेकर भगवान विष्णु की शरण में गए।

चूंकि हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी से वरदान मांगते समय जिन पशुओं के नाम लिए थे, उनमें उसने वराह’ (सूअर) का नाम नहीं लिया था, क्योंकि वह उसे बहुत तुच्छ जीव मानता था।

उसी समय ब्रह्मा जी की नाक से भगवान विष्णु एक अत्यंत सूक्ष्म (छोटे) वराह के रूप में प्रकट हुए। प्रकट होते ही वह वराह आकार में बढ़ने लगा और कुछ ही पलों में एक विशाल पर्वत के समान हो गया। उनकी गर्जना से दसों दिशाएं कांप उठीं।

भगवान वराह ने सीधे रसातल (समुद्र) में छलांग लगा दी। वहाँ उनका सामना महाबली राक्षस हिरण्याक्ष से हुआ। दोनों के बीच कई हजार वर्षों तक भयंकर युद्ध चला। अंततः भगवान वराह ने अपने तीखे दांतों और सुदर्शन चक्र से हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

राक्षस के वध के बाद, भगवान वराह ने डूबती हुई माता पृथ्वी (भूदेवी) को बड़े ही कोमलता से अपने सफेद, विशाल दांतों (Tusks) पर उठाया और उन्हें महासागर से बाहर निकाल कर उनके मूल स्थान पर स्थापित कर दिया। इस प्रकार भगवान ने पृथ्वी और धर्म की रक्षा की।

 

वराह जयंती का धार्मिक महत्व और मान्यताएं

भगवान विष्णु का यह अवतार हमें प्रकृति (पृथ्वी) के संरक्षण का सबसे बड़ा संदेश देता है। इस व्रत और पूजा का महत्व निम्नलिखित है:

  • भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, वराह अवतार ने भूदेवी (पृथ्वी) की रक्षा की थी। इसलिए जो भी व्यक्ति वराह जयंती के दिन व्रत और पूजा करता है, उसे भूमि, भवन (Property) और अचल संपत्ति का सुख प्राप्त होता है।
  • भय और शत्रुओं से मुक्ति: भगवान वराह शक्ति और साहस के प्रतीक हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति के मन का अज्ञात भय समाप्त होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
  • पापों का नाश: मान्यता है कि वराह जयंती के दिन श्रीहरि का ध्यान करने और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के पिछले जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

वराह जयंती की पूजा विधि

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जानी चाहिए:

  1. संकल्प: स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत या पूजा का संकल्प लें।
  2. प्रतिमा की स्थापना: घर के मंदिर में एक कलश स्थापित करें। भगवान विष्णु के वराह अवतार की तस्वीर या प्रतिमा (यदि उपलब्ध हो) को एक साफ चौकी पर पीले वस्त्र के ऊपर रखें।
  3. अभिषेक और श्रृंगार: भगवान को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। चंदन का तिलक लगाएं और पीले फूल, फल व पीले वस्त्र अर्पित करें।
  4. नैवेद्य: भगवान को विशेष रूप से तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) अवश्य अर्पित करें, क्योंकि तुलसी के बिना श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते।
  5. कथा और मंत्र जाप: वराह जयंती की व्रत कथा पढ़ें। ॐ वराहाय नमः’ या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का कम से कम 108 बार (एक माला) जाप करें।
  6. दान: पूजा के बाद ब्राह्मणों और गरीबों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान अवश्य करें।

निष्कर्ष

वराह जयंती केवल एक पौराणिक कथा का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे लिए एक गहरा प्रतीक है। हिरण्याक्ष उस लालच और अहंकार का प्रतीक है जो हमारी पृथ्वी (प्रकृति) का दोहन और विनाश करता है। वहीं भगवान वराह उस ईश्वरीय शक्ति और जिम्मेदारी का प्रतीक हैं, जो डूबती हुई धरती को बचाती है। आज के समय में, वराह जयंती हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने स्वार्थों को छोड़कर माता पृथ्वी (पर्यावरण) की रक्षा करनी चाहिए। सच्चे मन से भगवान वराह की उपासना करने से जीवन में स्थिरता, सुरक्षा और परम आनंद की प्राप्ति होती है।

|| ॐ वराहाय नमः ||

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