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विवस्वत सप्तमी 2026: तिथि, पूजा विधि, कथा और शुभ मुहूर्त
सुख-समृद्धि प्राप्त करने के लिए विवस्वत सप्तमी का महत्व पढ़ें।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की विवस्वत सप्तमी सोमवार, 20 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी ।

सप्तमी तिथि प्रारम्भ: 20 जुलाई 2026, प्रातः 03:30 बजे ।

सप्तमी तिथि समाप्त: 21 जुलाई 2026, प्रातः 04:03 बजे ।

 विवस्वत सप्तमी क्या है?

सनातन धर्म में ‘सूर्य देव’ एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो प्रतिदिन साक्षात रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। वेदों और पुराणों में सूर्य देव के अनेक नामों का वर्णन मिलता है, जिनमें से एक अत्यंत प्रभावशाली नाम है- विवस्वत’

हिन्दू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य के ‘विवस्वत’ स्वरूप की पूजा की जाती है, इसलिए इस दिन को विवस्वत सप्तमी  के नाम से जाना जाता है। यह दिन आरोग्य, तेज, यश और सफलता की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। यह दिन विशेष रूप से सातवें मनु (वैवस्वत मनु) के जन्म से भी जुड़ा हुआ है, जो वर्तमान मन्वंतर के अधिपति हैं।

आइए इस पावन पर्व की कथा, महत्व और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।

विवस्वत सप्तमी पर सूर्य देव की पूजा और जल अर्पण

पौराणिक कथा और महत्व

कथा: वैवस्वत मनु का जन्म

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विवस्वत सप्तमी के दिन सूर्य देव के पुत्र एवं वर्तमान मन्वंतर के सातवें मनु – वैवस्वत मनु का जन्म हुआ था। सनातन धर्म में वैवस्वत मनु को मानव जाति का आदि पुरुष और नई सृष्टि का प्रारंभकर्ता माना जाता है।

कथा के अनुसार, प्रजापति विश्वकर्मा की दिव्य एवं तेजस्विनी पुत्री संज्ञा का विवाह भगवान सूर्य देव, जिन्हें विवस्वान भी कहा जाता है, से हुआ था। संज्ञा ने सूर्य देव से कई संतानों को जन्म दिया, जिनमें यमराज, यमुना जी और एक तेजस्वी पुत्र श्रद्धादेव प्रमुख थे। यही श्रद्धादेव आगे चलकर वैवस्वत मनु के नाम से प्रसिद्ध हुए।

हिंदू धर्मग्रंथों में बताया गया है कि सृष्टि के संचालन के लिए प्रत्येक मन्वंतर में एक मनु नियुक्त होते हैं। एक कल्प में कुल 14 मनु होते हैं, और वर्तमान समय को सातवें मनु – वैवस्वत मनु का काल माना जाता है। इसलिए वर्तमान मन्वंतर को वैवस्वत मन्वंतर कहा जाता है।

 

मत्स्य अवतार और महाप्रलय की कथा

मत्स्य पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय पृथ्वी पर भयंकर प्रलय आने वाला था। चारों ओर जल ही जल फैलने लगा और सम्पूर्ण सृष्टि विनाश के कगार पर पहुँच गई। तब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा हेतु मत्स्य अवतार धारण किया।

कथा के अनुसार, एक दिन वैवस्वत मनु नदी में स्नान कर रहे थे। तभी उनके हाथों में एक छोटी मछली आई। उस मछली ने मनु से प्रार्थना की —
“हे राजन! मुझे बड़े जीवों से बचाइए।”

मनु ने दया करके उस मछली को अपने कमंडल में रख लिया। लेकिन वह मछली लगातार बड़ी होती गई। तब मनु ने उसे तालाब, फिर नदी और अंत में समुद्र में छोड़ दिया। उसी समय भगवान विष्णु ने अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन देकर कहा कि शीघ्र ही महाप्रलय आने वाली है।

भगवान ने वैवस्वत मनु को एक विशाल नाव बनाने का आदेश दिया और उसमें सप्तऋषियों, बीजों, औषधियों तथा जीवों के आवश्यक तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए कहा। जब प्रलय आया, तब भगवान विष्णु मत्स्य रूप में प्रकट हुए और उस नाव को अपने सींग से बाँधकर सुरक्षित मार्ग प्रदान किया।

प्रलय समाप्त होने के बाद वैवस्वत मनु ने पुनः सृष्टि का विस्तार किया। इसलिए उन्हें मानव सभ्यता का पुनर्स्थापक और धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है।

 

विवस्वत सप्तमी का महत्व

  • सूर्य देव की कृपा: इस दिन व्रत और पूजा करने से भगवान सूर्य प्रसन्न होते हैं और भक्तों को आरोग्य (स्वास्थ्य), धन, सुख और लंबी आयु का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
  • पापों से मुक्ति: माना जाता है कि इस दिन सूर्य पूजा और पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी तरह के जाने-अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मनु की पूजा: वैवस्वत मनु सृष्टि के पालक माने जाते हैं, इसलिए उनकी पूजा से जीवन में व्यवस्था और धर्म के पालन की प्रेरणा मिलती है।

प्रमुख मान्यताएं

  • नमक का त्याग (अलूना व्रत): विवस्वत सप्तमी के व्रत में नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन बिना नमक का भोजन (फलाहार या मीठा) ग्रहण करने से शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं।
  • लाल रंग का महत्व: सूर्य देव को लाल रंग अति प्रिय है। इसलिए इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना, लाल पुष्प और लाल चंदन का उपयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • दान-पुण्य: इस दिन तांबे के बर्तन, गेहूं, गुड़ और लाल वस्त्र का दान करने से कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है।

विवस्वत सप्तमी की पूजा विधि और अर्घ्य दान

इस दिन सूर्य देव की पूजा प्रातः काल (सूर्य उदय के समय) करना सबसे श्रेष्ठ होता है। इसकी सरल पूजा विधि इस प्रकार है:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि कर लें। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या कुंड में स्नान करें, अन्यथा घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. अर्घ्य तैयार करना: एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें। उसमें थोड़ा सा लाल चंदन (रोली), अक्षत (साबुत चावल), लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) और थोड़ा सा गुड़ डाल लें।
  3. सूर्य को अर्घ्य देना: उगते हुए सूर्य की ओर मुख (पूर्व दिशा) करके खड़े हो जाएं। दोनों हाथों से लोटे को सिर के ऊपर तक उठाएं और धीरे-धीरे जल की धारा गिराते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें।
  4. मंत्र जाप: अर्घ्य देते समय इस मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें— ॐ घृणि सूर्याय नमः” या ॐ विवस्वते नमः” या गायत्री मंत्र का जाप करें।
  5. प्रार्थना और परिक्रमा: जल अर्पित करने के बाद अपने स्थान पर ही खड़े होकर तीन बार गोल घूमकर परिक्रमा (आत्म-परिक्रमा) करें और सूर्य देव से अपने और अपने परिवार के उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
  6. आदित्य हृदय स्तोत्र: यदि संभव हो तो पूजा के समय ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ या ‘सूर्य चालीसा’ का पाठ अवश्य करें। यह असीम ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

निष्कर्ष

विवस्वत सप्तमी प्रकृति के सबसे बड़े ऊर्जा स्रोत के प्रति हमारी कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ मनुष्य बीमारियों और तनाव से घिरा हुआ है, विवस्वत सप्तमी का व्रत हमें प्रकृति के करीब ले जाता है और सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा से हमारे शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है।

|| ॐ सूर्याय नमः ||

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