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वृषभ संक्रांति 2026: तिथि, पुण्य काल और धार्मिक महत्व
जानें वृषभ संक्रांति पर स्नान-दान करने से क्यों मिलता है अक्षय पुण्य

वृषभ संक्रांति 2026 शुक्रवार, 15 मई को मनाई जाएगी। इस दिन सूर्यदेव सुबह 06:28 बजे वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे।

संक्रांति का पुण्य काल सुबह 05:30 बजे से 06:28 बजे तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि 58 मिनट है। यही समय महा पुण्य काल भी माना गया है।

इस शुभ मुहूर्त में स्नान, दान और सूर्य उपासना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

Surya dev pooja image

वृष संक्रांति क्या है?

ज्योतिष के अनुसार, संक्रांति वह समय है जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। जब सूर्य मेष राशि से निकलकर वृषभ (Taurus) राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे ‘वृष संक्रांति’ कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह आमतौर पर हर साल 14 या 15 मई के आस-पास आती है। इस दिन से हिन्दू सौर कैलेंडर का दूसरा महीना शुरू होता है। इस दिन को ‘पुण्य काल’ और ‘महापुण्य काल’ के रूप में जाना जाता है, जिसमें दान-पुण्य और पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व होता है।

वृष संक्रांति से जुड़ी कथा और आधार:

वृष संक्रांति से जुड़ी कोई एक विशेष पौराणिक कथा नहीं है, लेकिन यह पर्व सूर्य देव की महत्ता और राशि परिवर्तन के वैज्ञानिक व आध्यात्मिक सिद्धांत पर आधारित है:

हिन्दू धर्म में सूर्य को जीवन और ऊर्जा का प्रत्यक्ष स्रोत माना गया है। वह नवग्रहों के राजा हैं और उनकी हर गति (संक्रांति) को शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। वृष संक्रांति वह संक्रमण काल है जब सूर्य अपनी उच्च राशि (मेष) से निकलकर स्थिर राशि (वृषभ) में प्रवेश करते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यह परिवर्तन पृथ्वी पर जलवायु, कृषि और ऊर्जा को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव इस समय बढ़ने लगता है। इस दिन सूर्य देव के साथ-साथ शिव परिवार (भगवान शिव, माता पार्वती) और भगवान विष्णु की पूजा भी की जाती है। चूँकि वृषभ (बैल) नंदी का प्रतीक है, जो शिव के प्रिय वाहन हैं, इसलिए इस दिन भगवान शिव की आराधना का विशेष फल मिलता है।

महत्व और मान्यता

वृष संक्रांति का धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्व है:

1. धार्मिक महत्व

  • सूर्य पूजा और मंत्र: इस दिन प्रातः काल सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य देना (जल चढ़ाना) अत्यंत शुभ माना जाता है। अर्घ्य देते समय “ॐ घृणि सूर्याय नम:” या “ॐ आदित्याय नम:” मंत्र का जाप करना चाहिए।

  • गंगा स्नान और पवित्र जल: पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा में स्नान करने की परंपरा है। यदि नदी में स्नान संभव न हो, तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।

  • पितृ तर्पण: इस दिन पितरों (पूर्वजों) के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।

2. दान का विशेष महत्व (ग्रीष्म ऋतु के अनुसार)

वृष संक्रांति के समय गर्मियां अपने चरम पर होती हैं, इसलिए इस दिन जल और शीतलता प्रदान करने वाली चीजों का दान मोक्षदायी माना गया है।

  • इस दिन जल से भरा घड़ा (मटका), छाता, जूते-चप्पल, हाथ का पंखा, सत्तू, और मौसमी फलों का दान करना चाहिए।

  • वृष (बैल/गाय) राशि के प्रभाव के कारण इस दिन ‘गोदान’ (गाय का दान) या गौशाला में गायों के लिए चारे का प्रबंध करना महापुण्य माना गया है।

3. ज्योतिषीय और कृषि महत्व

  • राशि परिवर्तन: वृष राशि का स्वामी ग्रह ‘शुक्र’ है, जो धन, सौंदर्य, समृद्धि और भौतिक सुखों का कारक है। सूर्य का इस राशि में आना, भौतिक जीवन और सुख-सुविधाओं में वृद्धि के लिए बहुत शुभ माना जाता है।

  • अन्न की वृद्धि: यह समय कृषि के दृष्टिकोण से भी शुभ माना जाता है। किसान इस समय अपनी आने वाली फसलों के लिए अच्छी बारिश और पैदावार की कामना करते हैं।

4. पर्व की अन्य गतिविधियाँ और क्षेत्रीय मान्यता

  • व्रत और हवन: कई भक्त इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। घरों और मंदिरों में सूर्य देव व नवग्रहों को प्रसन्न करने के लिए हवन और यज्ञ किए जाते हैं।

  • क्षेत्रीय महत्व: दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में इस दिन से सौर कैलेंडर के नए महीने ‘वैकासी’ (Vaikasi) की शुरुआत होती है। वहीं, ओडिशा में भी संक्रांति के इस पर्व को भगवान जगन्नाथ की विशेष पूजा-अर्चना के साथ मनाया जाता है।

|| हर हर महादेव ||

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