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भाद्रपद पूर्णिमा उपवास: सत्यनारायण और उमा-महेश्वर की कृपा तथा
पितरों के तर्पण का पावन दिन

वर्ष 2026 मे भाद्रपद पूर्णिमा: शनिवार, 26 सितम्बर 2026 को मनाई जाएगी

पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय: सायं 5:58 बजे होगा 

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 25 सितम्बर 2026 को रात्रि 11:06 बजे से 

पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 सितम्बर 2026 को रात्रि 10:18 बजे तक 

सनातन हिंदू पंचांग में प्रत्येक मास की पूर्णिमा (Full Moon) तिथि का अपना एक विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। वर्षा ऋतु के समापन और शरद ऋतु के आगमन के बीच पड़ने वाली भाद्रपद (भादों) मास की पूर्णिमा को धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पवित्र माना गया है।

इस पूर्णिमा को पूर्णिमा श्राद्ध या भाद्रपद पूनम के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन न केवल भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना का दिन है, बल्कि इसी दिन उमा-महेश्वर व्रत (भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा) भी रखा जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी पूर्णिमा तिथि के साथ 16 दिवसीय पितृ पक्ष‘ (महालय) की शुरुआत हो जाती है। आइए, भाद्रपद पूर्णिमा उपवास के अर्थ, इसके गहरे महत्व, पौराणिक कथा और पूजा विधि को विस्तार से समझते हैं।

Bhadrapada Purnima Hindu Festival

भाद्रपद पूर्णिमा उपवास क्या है?

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को भाद्रपद पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है।

इस दिन मुख्य रूप से दो प्रकार के उपवास और पूजा का विधान है:

  1. सत्यनारायण व्रत: परिवार की सुख-शांति के लिए भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा और कथा।
  2. उमा-महेश्वर व्रत: यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा अखंड सौभाग्य और जीवन के सभी कष्टों को दूर करने के लिए रखा जाता है, जिसमें भगवान शिव (महेश्वर) और माता पार्वती (उमा) की उपासना की जाती है।

भाद्रपद पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

यह पूर्णिमा देव पूजा और पितृ पूजा दोनों का एक अद्भुत संगम है। इसका महत्व निम्नलिखित है:

  • पितृ पक्ष का आरंभ (पूर्णिमा श्राद्ध): भाद्रपद पूर्णिमा के दिन उन पितरों (पूर्वजों) का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुई हो। इसे ‘प्रोष्ठपदी पूर्णिमा’ भी कहते हैं। इस दिन से पितृ लोक के द्वार खुल जाते हैं और पूर्वज धरती पर आते हैं।
  • पापों से मुक्ति और मोक्ष: मान्यता है कि इस दिन किसी पवित्र नदी (गंगा, यमुना आदि) में स्नान करने और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • सौभाग्य की प्राप्ति: ‘उमा-महेश्वर व्रत’ करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है और कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर मिलता है।
  • धन और ऐश्वर्य: इस रात चंद्रमा की पूजा करने और माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाने से घर से दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है।

भाद्रपद पूर्णिमा (उमा-महेश्वर) की पौराणिक व्रत कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा भगवान शिव के दर्शन कर कैलाश से लौट रहे थे। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने प्रसाद स्वरूप बिल्वपत्रों की एक दिव्य माला प्रदान की।

मार्ग में महर्षि दुर्वासा की भेंट भगवान श्रीहरि विष्णु से हुई। श्रद्धापूर्वक उन्होंने वह दिव्य माला भगवान विष्णु को अर्पित कर दी। भगवान विष्णु ने उस माला का सम्मान करते हुए उसे अपने वाहन गरुड़ के गले में धारण करा दिया।

महर्षि दुर्वासा ने इसे भगवान शिव के प्रसाद का उचित सम्मान न मानते हुए क्रोध प्रकट किया। उन्होंने कहा, “हे विष्णु! शिव प्रसाद के प्रति यह व्यवहार उचित नहीं है। इसके परिणामस्वरूप तुम्हें कुछ समय के लिए श्री (महालक्ष्मी) से वियोग सहना पड़ेगा।”

महर्षि के श्राप के प्रभाव से भगवान विष्णु का माता महालक्ष्मी से वियोग हो गया। इसके साथ ही देवताओं का तेज, ऐश्वर्य और वैभव भी क्षीण होने लगा। देवगण चिंतित होकर भगवान शिव और माता पार्वती की शरण में पहुँचे तथा उनसे इस संकट से मुक्ति का उपाय पूछा।

भगवान शिव ने देवताओं और भगवान विष्णु को भाद्रपद पूर्णिमा के दिन माता उमा (पार्वती) के साथ उनके संयुक्त स्वरूप उमा-महेश्वर की विधिपूर्वक पूजा एवं व्रत करने का उपदेश दिया। सभी ने श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक व्रत का पालन किया तथा भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की।

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव और माता पार्वती ने महर्षि दुर्वासा के श्राप का प्रभाव समाप्त कर दिया। भगवान विष्णु का पुनः माता महालक्ष्मी से मिलन हुआ तथा देवताओं को उनका खोया हुआ ऐश्वर्य और सुख वापस प्राप्त हो गया।

तभी से धार्मिक मान्यता है कि भाद्रपद पूर्णिमा के दिन श्रद्धापूर्वक उमा-महेश्वर व्रत करने, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने तथा इस व्रत कथा का श्रवण करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है, परिवार में समृद्धि आती है और भक्त पर भगवान शिव-पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

यह कथा विभिन्न पुराणों एवं क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं में प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है।

 

भाद्रपद पूर्णिमा की पूजा विधि और मुख्य नियम

इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और शिव-पार्वती की पूजा अत्यंत श्रद्धा भाव से की जाती है:

  1. पवित्र स्नान और संकल्प: पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी या घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र पहनकर उपवास का संकल्प लें।
  2. सत्यनारायण और शिव पूजा: घर के मंदिर में एक चौकी पर भगवान सत्यनारायण (विष्णु जी) और शिव-पार्वती की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
  3. अभिषेक और श्रृंगार: भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। चंदन, कुमकुम, अक्षत, पीले और सफेद पुष्प अर्पित करें।
  4. नैवेद्य (भोग): भगवान सत्यनारायण को पंजीरी, पंचामृत और केले का भोग लगाएं (तुलसी दल अवश्य डालें)। शिव जी को बेलपत्र और भांग अर्पित करें। माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं।
  5. कथा और आरती: सत्यनारायण भगवान की कथा या उमा-महेश्वर व्रत की कथा पढ़ें और आरती उतारें।
  6. चंद्र दर्शन और अर्घ्य: पूर्णिमा की रात को चंद्रमा को कच्चे दूध, जल और अक्षत से अर्घ्य दें। इससे मानसिक शांति मिलती है।
  7. दान-पुण्य: इस दिन ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या छाते का दान करना हजार गुना फलदायी माना जाता है। जो लोग पूर्णिमा का श्राद्ध करते हैं, वे इस दिन तर्पण कर ब्राह्मण भोज कराते हैं।

निष्कर्ष

भाद्रपद पूर्णिमा का उपवास हमें यह सिखाता है कि शक्ति और संपत्ति मिलने पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, जैसा कि देवराज इंद्र ने किया था। यह पावन दिन देवों की कृपा पाने और अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे उत्तम अवसर है। सच्चे मन से किया गया यह उपवास जीवन में न केवल भौतिक सुख-सुविधाएं लाता है, बल्कि आत्मा को भी पवित्र कर मोक्ष की ओर ले जाता है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
भाद्रपद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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