कमला जयंती: धन, ऐश्वर्य और तंत्र साधना की अधिष्ठात्री 'दसवीं महाविद्या' का प्राकट्य दिवस
कमला जयन्ती रविवार, नवम्बर 8, 2026 को
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 08, 2026 को 11:27 बजे से
अमावस्या तिथि समाप्त – नवम्बर 09, 2026 को 12:31 बजे तक
सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में ‘दस महाविद्याओं’ (Ten Mahavidyas) की साधना का सर्वोच्च स्थान है। इन दस महाविद्याओं में सबसे अंतिम यानी 10वीं महाविद्या देवी ‘कमला‘ (Goddess Kamala) हैं। देवी कमला को साक्षात माता लक्ष्मी का ही तांत्रिक और सर्वोच्च स्वरूप माना जाता है।
दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas)- माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमस्ता, माँ त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला
कमला जयंती वह अत्यंत पवित्र दिन है, जब देवी कमला के इसी अलौकिक स्वरूप की आराधना की जाती है। तंत्र और वैदिक दोनों ही शास्त्रों में यह मान्यता है कि देवी कमला की उपासना करने वाले साधक को जीवन में कभी भी दरिद्रता (गरीबी) का मुंह नहीं देखना पड़ता; उसे इस संसार के सभी भौतिक सुख (भोग) और मृत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त होता है। आइए, कमला जयंती के अर्थ, इसके गहरे महत्व, समुद्र मंथन से जुड़ी कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।
देवी कमला कौन हैं और कमला जयंती कब मनाई जाती है?
‘कमल‘ के पुष्प पर विराजमान होने के कारण ही देवी का नाम ‘कमला‘ पड़ा है। उनके स्वरूप में चार सफेद हाथी अपनी सूंड में अमृत के कलश लेकर उन्हें स्नान कराते हुए दिखाई देते हैं। यह स्वरूप शुद्धता, समृद्धि और असीम सौंदर्य का प्रतीक है।
जयंती की तिथि: तंत्र शास्त्र के अनुसार, देवी कमला का मुख्य पर्व कार्तिक मास की अमावस्या (जिस दिन दीपावली मनाई जाती है) को ही कमला जयंती के रूप में मनाया जाता है। दीपावली की रात (महानिशा) तांत्रिक साधक माता लक्ष्मी के ‘कमला महाविद्या’ स्वरूप की ही विशेष साधना करते हैं। इसके अलावा, मार्गशीर्ष (अगहन) मास में भी कुछ स्थानों पर कमला जयंती विशेष अनुष्ठान के साथ मनाई जाती है।
कमला महाविद्या का धार्मिक और तांत्रिक महत्व
देवी कमला केवल धन की देवी नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण सृष्टि के विकास और चेतना की प्रतीक हैं। उनका महत्व इस प्रकार है:
- भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति: अन्य देवियों की साधना जहाँ या तो केवल भौतिक सुख देती है या केवल वैराग्य, वहीं देवी कमला एकमात्र ऐसी महाविद्या हैं जो साधक को अपार धन-संपत्ति (भोग) के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान (मोक्ष) भी प्रदान करती हैं।
- अखंड सौभाग्य और दरिद्रता का नाश: इनकी उपासना से कर्ज के पहाड़ टूट जाते हैं, व्यापार में अपार सफलता मिलती है और घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।
- शत्रु बाधा और ग्रहों का शमन: देवी कमला शुक्र ग्रह (Venus) को नियंत्रित करती हैं। इनकी पूजा से शुक्र ग्रह से जुड़े सभी दोष शांत होते हैं और जीवन में आकर्षण व प्रेम बढ़ता है।
कमला जयंती की पौराणिक कथा (समुद्र मंथन का प्रसंग)
देवी कमला के प्राकट्य की कथा सीधे तौर पर ‘समुद्र मंथन’ की उस महान घटना से जुड़ी है, जब तीनों लोकों से श्री (धन और वैभव) लुप्त हो गया था:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा अपने गले में पारिजात पुष्पों की एक दिव्य माला पहने हुए जा रहे थे। रास्ते में उन्हें देवराज इंद्र मिले, जो अपने ऐरावत हाथी पर सवार थे। महर्षि दुर्वासा ने सम्मान स्वरूप वह दिव्य माला इंद्र को दे दी। अहंकार में चूर इंद्र ने वह माला अपने हाथी के मस्तक पर रख दी और हाथी ने उसे सूंड से खींचकर पैरों तले कुचल दिया।
यह देखकर महर्षि दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने देवराज इंद्र को श्राप दिया- “जिस लक्ष्मी (श्री) के अहंकार में तूने मेरा अपमान किया है, वह लक्ष्मी तीनों लोकों से विलुप्त होकर समुद्र में चली जाएगी।”
श्राप के प्रभाव से स्वर्ग और पृथ्वी से सारा वैभव, धन, और सुख-शांति समाप्त हो गई। देवता शक्तिहीन हो गए और असुरों ने स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए।
भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर में ‘समुद्र मंथन‘ करने की सलाह दी। जब वासुकि नाग की नेती और मंदराचल पर्वत की मथानी बनाकर समुद्र को मथा गया, तो उसमें से 14 अनमोल रत्न निकले।
उन्हीं रत्नों में से कार्तिक अमावस्या के दिन एक खिले हुए विशाल कमल के पुष्प पर अत्यंत तेजोमयी, अनुपम सुंदरी और चार भुजाओं वाली ‘देवी कमला‘ (माता लक्ष्मी) प्रकट हुईं। चार सफेद दिग्गजों (हाथियों) ने स्वर्ण कलशों से उनका अभिषेक किया। देवी कमला ने भगवान श्रीहरि विष्णु के गले में वैजयंती माला डालकर उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया। देवी के प्राकट्य से तीनों लोकों में पुनः धन, वैभव और खुशहाली लौट आई।
कमला जयंती की विशेष पूजा विधि
देवी कमला की पूजा विशेष रूप से रात्रि के समय (निशीथ काल) में की जाती है। इसकी विधि इस प्रकार है:
- आसन और स्थापना: मध्य रात्रि में स्नान कर लाल या गुलाबी रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर देवी कमला (माता लक्ष्मी) और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि आपके पास ‘श्री यंत्र‘ (Sri Yantra) या ‘कमला यंत्र‘ हो, तो उसे अवश्य रखें।
- विशेष अर्पित सामग्री: देवी कमला को लाल रंग अत्यंत प्रिय है। उन्हें लाल कुमकुम का तिलक लगाएं। साबुत अक्षत, लाल गुलाब या विशेष रूप से कमल के फूल (Lotus) अर्पित करें।
- कमलगट्टे और नैवेद्य: माता को कमलगट्टे (कमल के बीज) अवश्य चढ़ाएं। भोग में मखाने की खीर, अनार, सफेद मिठाई और पंचामृत अर्पित करें।
- मंत्र जाप: घी का दीपक जलाकर ‘कमलगट्टे की माला’ (Lotus seed rosary) से देवी के इस अत्यंत सिद्ध तांत्रिक मंत्र का कम से कम 108 बार (1 माला) जाप करें:
- मंत्र: “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः”
- आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में माता लक्ष्मी की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
मुख्य मान्यताएं और नियम (क्या करें, क्या न करें)
- स्वच्छता अनिवार्य है: देवी कमला को गंदगी से सख्त नफरत है। इसलिए इस दिन घर का कोना-कोना साफ होना चाहिए। स्वयं के विचारों में भी किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष न रखें।
- स्त्रियों का सम्मान: तंत्र शास्त्र के अनुसार, जो व्यक्ति अपने घर की महिलाओं (पत्नी, माता, पुत्री) का अपमान करता है, देवी कमला उसकी पूजा कभी स्वीकार नहीं करतीं।
- दान का महत्व: इस दिन किसी सुहागिन महिला को श्रृंगार की सामग्री (लाल चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी) और अन्न का दान करना धन वृद्धि का अचूक उपाय है।
निष्कर्ष
कमला जयंती का यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि धन और वैभव बुरा नहीं है, बशर्ते वह धर्म और सत्य के मार्ग पर चलकर प्राप्त किया गया हो। देवी कमला उसी घर में वास करती हैं, जहाँ प्रेम, स्वच्छता और भगवान विष्णु (सत्य) का सम्मान होता है। देवराज इंद्र की कथा हमें यह भी सिखाती है कि संपत्ति का अहंकार विनाश का कारण बनता है। देवी कमला की सच्ची आराधना व्यक्ति के जीवन को कमल के फूल की तरह खिलखिलाता और सुगंधित बना देती है, जहाँ संसार की कोई भी दरिद्रता प्रवेश नहीं कर सकती।
|| जय माँ कमला ||
