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त्रिपुर भैरवी जयंती: शत्रुओं के नाश, भय मुक्ति और दस महाविद्या की 5वीं देवी का प्राकट्य दिवस

माँ त्रिपुर भैरवी जयंती बुधवार, 23 दिसम्बर 2026 को मनाई जाएगी।

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 23 दिसम्बर 2026 को प्रातः 10:47 बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 दिसम्बर 2026 को प्रातः 06:57 बजे

सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में ‘दस महाविद्याओं’ (दश महाशक्तियों) की साधना का सर्वोच्च स्थान है। इन्हीं दस महाविद्याओं में से पांचवीं महाविद्या हैं- माँ त्रिपुर भैरवी (Mata Tripur Bhairavi)। माँ का यह स्वरूप अत्यंत उग्र, तेजस्वी और भय को नष्ट करने वाला है।

दस महाविद्याओं (Ten Mahavidyas)- माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमस्ता, माँ त्रिपुर भैरवी, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी, माँ कमला

हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष (अगहन) मास की पूर्णिमा तिथि को माँ त्रिपुर भैरवी का अवतरण हुआ था, इसलिए इस पावन दिन को त्रिपुर भैरवी जयंती के रूप में मनाया जाता है। (इसी दिन भगवान दत्तात्रेय और माता अन्नपूर्णा की जयंती भी मनाई जाती है)। जो भी साधक इस दिन माँ त्रिपुर भैरवी की उपासना करता है, उसके जीवन से बड़े से बड़ा भय, संकट और शत्रु बाधा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। आइए, माँ के इस उग्र स्वरूप के अर्थ, इसके गहरे तांत्रिक व सांसारिक महत्व, प्राकट्य की पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

माँ त्रिपुर भैरवी जयंती पर लाल वस्त्र धारण किए दिव्य स्वरूप में विराजमान माँ त्रिपुर भैरवी, कमलासन, त्रिशूल, जपमाला, तेजस्वी आभा

त्रिपुर भैरवी जयंती क्या है?

‘त्रिपुर भैरवी’ नाम के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ छिपा है:

  • त्रिपुर (Tripur): इसका अर्थ है ‘तीन लोक’ (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) या मनुष्य की तीन अवस्थाएं (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति)।
  • भैरवी (Bhairavi): ‘भैरवी’ का अर्थ है भयानक, उग्र या वह शक्ति जो सभी प्रकार के भयों (Fears) का नाश कर दे। भगवान शिव के उग्र रूप ‘काल भैरव’ की आदिशक्ति को ही भैरवी कहा जाता है।

माँ त्रिपुर भैरवी का स्वरूप उगते हुए हजारों सूर्यों के समान लाल और चमकदार है। उन्होंने गले में मुंडमाला (खोपड़ियों की माला) धारण की है। उनके चार हाथ हैं- जिनमें से दो हाथों में वे विद्या (पुस्तक) और जप माला धारण करती हैं, और अन्य दो हाथों से वे भक्तों को अभय (सुरक्षा) और वरदान देती हैं।

 

त्रिपुर भैरवी जयंती का धार्मिक और तांत्रिक महत्व

माँ त्रिपुर भैरवी की साधना केवल तांत्रिक ही नहीं, बल्कि गृहस्थ लोग भी कर सकते हैं। इनकी उपासना के प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

  • भय और मृत्यु के डर का नाश: माँ की कृपा से साधक के मन से अकाल मृत्यु, दुर्घटना और हर प्रकार का अज्ञात भय हमेशा के लिए दूर हो जाता है।
  • शत्रु बाधा से मुक्ति: यदि कोई अकारण आपको परेशान कर रहा है या कोई कोर्ट-कचहरी का मामला अटका है, तो माँ की पूजा शत्रुओं का शमन करती है।
  • कुंडलिनी जागरण: तंत्र शास्त्र के अनुसार, माँ त्रिपुर भैरवी मनुष्य के ‘मूलाधार चक्र’ (Root Chakra) में निवास करती हैं। इनकी उपासना से कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है।
  • ज्ञान और सफलता: माँ के हाथों में पुस्तक और जप माला है, जो यह दर्शाती है कि वे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर विद्या और सफलता प्रदान करती हैं।

माँ त्रिपुर भैरवी के प्राकट्य की पौराणिक कथा (दस महाविद्याओं की उत्पत्ति)

माँ त्रिपुर भैरवी की कथा माता सती और भगवान शिव के बीच हुए एक ऐतिहासिक संवाद से जुड़ी है:

शिव पुराण और तंत्र ग्रंथों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) ने कनखल में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने जानबूझकर अपनी पुत्री सती और दामाद भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए अत्यंत व्याकुल थीं, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने से यह कहकर रोक दिया कि बिना निमंत्रण के जाना अपमानजनक होगा।

भगवान शिव के इस इंकार से माता सती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उनका रूप भयंकर होने लगा और उनके क्रोध को देखकर शिव जी वहां से जाने लगे। शिव जी को रोकने और अपनी शक्ति का अहसास कराने के लिए माता सती ने दसों दिशाओं में अपने 10 अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली स्वरूप प्रकट किए।

इन्हीं 10 स्वरूपों को दस महाविद्या कहा गया। माता सती ने दक्षिण दिशा में जिस उग्र और तेजस्वी स्वरूप को प्रकट किया, वही माँ त्रिपुर भैरवी थीं। माता के इन भयंकर रूपों को देखकर भगवान शिव ने सती को यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव ने ब्रह्मांड के संहार (Destruction) का रूप धारण किया, तो उनकी उस संहारक शक्ति से ही देवी त्रिपुर भैरवी की उत्पत्ति हुई। यह देवी विनाश में भी नवनिर्माण का बीज बोती हैं।

 

त्रिपुर भैरवी जयंती की पूजा विधि और नियम

माँ त्रिपुर भैरवी की पूजा में लाल रंग का बहुत अधिक महत्व है। जयंती के दिन इस विधि से पूजा करनी चाहिए:

  1. स्नान और संकल्प: मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करें और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। पूरे दिन व्रत रखने और माँ की पूजा का संकल्प लें।
  2. चौकी की स्थापना: रात के समय (निशीथ काल में) एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ त्रिपुर भैरवी या देवी दुर्गा की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें। साथ ही शिव जी (भैरव रूप) की भी स्थापना करें।
  3. लाल वस्तुओं का प्रयोग: माँ को लाल कुमकुम का तिलक लगाएं। उन्हें लाल गुड़हल के फूल, लाल चुनरी, सिंदूर और लाल चूड़ियाँ अर्पित करें।
  4. विशेष भोग: माँ को लाल फलों (जैसे अनार, सेब), शहद, और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं।
  5. सरसों के तेल का दीपक: माँ की प्रतिमा के सामने सरसों के तेल या घी का दीपक जलाएं और गुग्गुल की धूप दिखाएं।
  6. मंत्र जाप: रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला से माँ के सिद्ध मंत्र ॐ त्रिपुर भैरव्यै नम: या ह्स्रैं ह्सक्लीं ह्स्रौः का कम से कम 108 बार जाप करें।

मुख्य मान्यताएं (क्या करें, क्या न करें)

  • भैरव पूजा अनिवार्य: तंत्र शास्त्र के अनुसार, महाविद्या की कोई भी पूजा तब तक सफल नहीं होती जब तक उनके साथ भगवान शिव (भैरव) की पूजा न की जाए। इसलिए इस दिन भगवान शिव की आराधना अवश्य करें।
  • सात्विकता बनाए रखें: गृहस्थ जीवन वाले लोगों को इस दिन पूर्ण सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मांस-मदिरा का सेवन वर्जित है।
  • अहंकार का त्याग: माँ त्रिपुर भैरवी अहंकार की शत्रु हैं। उनकी पूजा करते समय मन में पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए।

निष्कर्ष

त्रिपुर भैरवी जयंती का यह महापर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में बुराइयों और संकटों से डरने के बजाय उनका डटकर सामना करना चाहिए। माँ त्रिपुर भैरवी केवल विनाश की देवी नहीं हैं, बल्कि वे हमारे भीतर छिपे अज्ञान, भय और कमजोरियों का संहार कर हमें आत्म-विश्वास और साहस का नया जन्म देती हैं। मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पावन रात में माँ की सच्ची आराधना मनुष्य को संसार के सभी भयों से मुक्त कर अभयदान प्रदान करती है।

माँ त्रिपुर भैरवी जयंती के पावन अवसर पर आदिशक्ति माँ त्रिपुर भैरवी सभी भक्तों को साहस, आत्मबल, आध्यात्मिक शक्ति, सुख, समृद्धि और जीवन में सफलता का आशीर्वाद प्रदान करें।

॥ ॐ ह्रीं त्रिपुरभैरव्यै नमः ॥ 

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