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मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत: श्रीहरि विष्णु की असीम कृपा, स्नान-दान और मोक्ष प्राप्ति

मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत बुधवार, 23 दिसम्बर 2026 को रखा जाएगा।

पूर्णिमा व्रत के दिन चंद्रोदय: सायं 04:41 बजे

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ: 23 दिसम्बर 2026 को प्रातः 10:47 बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 दिसम्बर 2026 को प्रातः 06:57 बजे

सनातन हिंदू पंचांग में ‘मार्गशीर्ष’ (अगहन) मास को सभी महीनों में सबसे पवित्र माना गया है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ।” इस पावन महीने के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि, जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर आकाश में चमकता है, उसे मार्गशीर्ष पूर्णिमा‘ (Margashirsha Purnima) या ‘अगहन पूर्णिमा’ कहा जाता है।

हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा का महत्व कार्तिक पूर्णिमा के समान ही पुण्यदायी माना गया है। यह दिन भगवान श्रीहरि विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की विशेष आराधना के लिए समर्पित है। इसी पावन तिथि पर भगवान दत्तात्रेय, माता अन्नपूर्णा और माँ त्रिपुर भैरवी का भी प्राकट्य हुआ था, जो इस दिन की महत्ता को कई गुना बढ़ा देता है। आइए, इस महाव्रत के अर्थ, इसके गहरे महत्व, पौराणिक कथा और पूजा के नियमों को विस्तार से समझते हैं।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर पूर्ण चंद्रमा की चांदनी में पवित्र नदी तट पर स्नान, भगवान विष्णु की पूजा, दीपदान

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन आध्यात्मिक साधना, स्नान और दान-पुण्य के लिए एक वरदान माना जाता है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

  • स्नान और दान का महापुण्य: इस दिन गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने और गरीबों को दान (विशेषकर गर्म कपड़े और अन्न) देने से 32 गुना अधिक फल मिलता है, इसलिए इसे ‘बत्तीसी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है।
  • सत्यनारायण भगवान की कृपा: इस दिन घर में सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और व्रत रखने से परिवार में सुख-शांति, धन-धान्य और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
  • चंद्र दोष से मुक्ति: पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी पूर्ण अवस्था में होता है। रात के समय चंद्र देव को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव, डिप्रेशन और कुंडली का ‘चंद्र दोष’ समाप्त हो जाता है।
  • त्रिदेवों (दत्तात्रेय) का आशीर्वाद: इसी दिन ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सम्मिलित अवतार ‘भगवान दत्तात्रेय’ की जयंती मनाई जाती है, जिनकी पूजा से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पौराणिक कथा (माता अनुसूया और त्रिदेवों की परीक्षा)

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन कई ऐतिहासिक घटनाएं घटीं, लेकिन सबसे प्रमुख कथा भगवान दत्तात्रेय के जन्म से जुड़ी है:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनुसूया अपने पतिव्रत धर्म और सतीत्व के लिए पूरे ब्रह्मांड में विख्यात थीं। उनके सतीत्व की चर्चा स्वर्ग लोक तक पहुंच गई। माता पार्वती, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती को यह जानकर थोड़ी ईर्ष्या हुई कि पृथ्वी पर कोई स्त्री उनसे भी अधिक सती हो सकती है।

तीनों देवियों ने अपने-अपने पतियों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) से हठ किया कि वे पृथ्वी पर जाकर माता अनुसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लें।

अपनी पत्नियों के आग्रह पर, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) साधु का वेश धारण करके महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे। उस समय महर्षि अत्रि आश्रम में नहीं थे। त्रिदेवों ने माता अनुसूया से भिक्षा मांगी, लेकिन उन्होंने एक शर्त रख दी कि हम भिक्षा तभी ग्रहण करेंगे, जब तुम निर्वस्त्र होकर हमें भोजन परोसोगी।”

यह सुनकर माता अनुसूया पहले तो घबरा गईं, लेकिन अपने योग बल और पतिव्रत धर्म से उन्होंने जान लिया कि ये कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि स्वयं त्रिदेव हैं। माता अनुसूया ने अपने पति का स्मरण करते हुए एक अभिमंत्रित जल उन तीनों साधुओं पर छिड़क दिया।

जल का स्पर्श होते ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश छह महीने के छोटे शिशु (बच्चे) बन गए। इसके बाद माता अनुसूया ने अपनी ममता से उन्हें भोजन कराया और पालने में झुलाने लगीं।

जब कई दिनों तक त्रिदेव वापस नहीं लौटे, तो तीनों देवियां (सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती) घबराकर अत्रि आश्रम पहुंचीं। वहां उन्होंने अपने पतियों को शिशु रूप में देखा। देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा मांगी और अपने पतियों को मूल रूप में वापस लाने की प्रार्थना की।

माता अनुसूया ने देवियों की प्रार्थना स्वीकार कर पुनः जल छिड़क कर त्रिदेवों को उनके असली रूप में ला दिया। माता अनुसूया के सतीत्व और ममता से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।

कालांतर में, मार्गशीर्ष पूर्णिमा के शुभ दिन ही त्रिदेवों के अंश से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, जिनके तीन सिर (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) और छह भुजाएं थीं।

 

मार्गशीर्ष पूर्णिमा की पूजा विधि और व्रत के नियम

इस पावन दिन पर भगवान विष्णु और चंद्र देव की कृपा पाने के लिए निम्नलिखित विधि से पूजा करनी चाहिए:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुएं के पास स्नान करें। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर ‘हर हर गंगे’ कहते हुए स्नान करें।
  2. व्रत का संकल्प और सत्यनारायण पूजा: स्वच्छ वस्त्र पहनकर हाथ में जल लें और दिन भर व्रत रखने का संकल्प लें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान सत्यनारायण (विष्णु जी) और माता लक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करें।
  3. तुलसी और पंचामृत का भोग: भगवान विष्णु को पीले फूल, पीले वस्त्र, चंदन और तुलसी दल अर्पित करें। उन्हें पंचामृत, चूरमा (पंजीरी) और केले का भोग लगाएं। इसके पश्चात श्री सत्यनारायण व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  4. चंद्रमा को अर्घ्य: पूर्णिमा की शाम (चंद्रोदय के समय) एक चांदी या तांबे के लोटे में जल, कच्चा दूध, सफेद फूल और अक्षत (चावल) डालकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय ॐ सों सोमाय नम: मंत्र का जाप करें।
  5. दीपदान और दान: शाम के समय तुलसी के पौधे के पास और घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाएं। ब्राह्मणों या गरीबों को अन्न, गर्म कपड़े, तिल और गुड़ का दान करें।
  6. पारण (व्रत खोलना): चंद्र दर्शन और पूजा के बाद बिना नमक का सात्विक भोजन या मीठा फलाहार ग्रहण कर व्रत पूर्ण करें।

मुख्य मान्यताएं (क्या करें, क्या न करें)

  • सात्विक जीवन: मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। मन, कर्म और वचन से सात्विक रहें।
  • क्रोध पर नियंत्रण: पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का प्रभाव पृथ्वी के जल तत्व (और मनुष्य के मन) पर सबसे अधिक होता है। इस दिन क्रोध करने या किसी का अपमान करने से मानसिक दोष उत्पन्न होता है।
  • तुलसी न तोड़ें: पूर्णिमा के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। भगवान विष्णु की पूजा के लिए एक दिन पहले ही तुलसी दल तोड़ कर रख लेना चाहिए।

निष्कर्ष

मार्गशीर्ष पूर्णिमा केवल चंद्रमा के पूर्ण होने की खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर ज्ञान, करुणा और भक्ति के पूर्ण होने का प्रतीक है। माता अनुसूया की कथा हमें यह सिखाती है कि सतीत्व और सत्य की शक्ति के सामने ईश्वर को भी झुकना पड़ता है। इस पवित्र तिथि पर किया गया सत्यनारायण भगवान का व्रत और पवित्र नदियों में स्नान, मनुष्य के जीवन से अज्ञानता के अंधेरे को दूर कर, उसे चंद्रमा के समान उज्ज्वल और शांत बना देता है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान श्रीहरि विष्णु एवं माता लक्ष्मी की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का वास हो।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

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